बुधवार, 23 नवंबर 2022

सुणी लीजे..

सुणी लीजे अरज म्हारा राम,
सुणी लीजे अरदास..
थारे नामे चाली म्हारा राम,
चाली म्हारी नाव..
सुणी लीजे हेलो म्हारो राम,
सुणी लीजे अरदास..
थु ही म्हारी राखे म्हारा राम,
छूटी मन री आस..
सुणी लीजे साँचा म्हारा राम,
सुणी लीजे अरदास.. 

~अक्षिणी

शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

कैसे होगा दिल्ली..?

राजधानी हो..
राजरानी बन राज पर अधिकार चाहिए..
पूरे विश्व में अकेली अपनी पहचान चाहिए..
सारे जहाज, सारी रेलगाड़ियाँ तुम्हें चाहिए..
मेट्रो-सेट्रो,हवाई अड्डे,जहाज
देशीय-अन्तर्देशीय बसों पर बहार चाहिए..
माल ढोने को ट्रकों का अंबार,
फिर टैक्सियाँ हजार चाहिए
हर आदमी को इक बड़ी कार
घर में दुपहिया-चौपहिया चार चाहिए
वातानुकूलन,शीतलक लगातार,
खाने में बीसियों व्यंजनों का भंडार चाहिए
हर रोज ताजा अखबार चाहिए
पड़ोसी पराली का प्यार चाहिए
फेफड़ों में हवा खुशबूदार चाहिए!

कैसे होगा दिल्ली..?
~अक्षिणी

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

आवजे भगवान..

आवजे भगवान,
थु आवजे भगवान,
आई सके तो आवजे भगवान..

तारी सके तो तार दीजे,
इ जीवणी री नाव..
मारी सके तो मार
आवजे भगवान..

राखी सके तो राख लीजे,
थारे नाम री लाज..
आवजे भगवान..

बाँधी सके तो बाँध दीजे,
इ करमा री गाँठ..
आवजे भगवान..

न्याव करे तो न्याव करजे,
त्राण करे तो त्राण..
आवजे भगवान..
थु आवजे भगवान..

~अक्षिणी






गुरुवार, 27 अक्तूबर 2022

First they came for..

First they came for tilak,
I didn't speak as I was secular..
Then they came for Ganpati,
I didn't speak as I was understanding..
Then they came for
Garba,
I didn't speak as I was accomodating..
Then they came for crackers,
I didn't speak as I was understanding..
Then they came for my way of life,
I didn't speak as I was secular..
Would they come for my house?
I can't speak as I am shit scared..
Would they come for my life?
I can't speak as I am dreading the day!!

#Liberals
Inspired from
#MartinNiemollar

सोमवार, 24 अक्तूबर 2022

मनुहारी आँखें..

मन ही मन मन तोल रही हैं,
साजन की व्यापारी आँखें..
छन ही छन में मोल ही लेंगी
सजनी की लाचारी आँखें..

बिन बोले ही बोल रही हैं
साजन की मतवारी आँखें..
देखना इनमें डूब रहेंगी,
सजनी की पतवारी आँखें..


नेह किरण से छलक रही हैं
साजन की रतनारी आँखें..
आज मिलन का टैक्स भरेंगी,
सजनी की छतनारी आँखें..

गति सीमा को तोड़ रही हैं,
साजन की मनुहारी आँखें..
लगता है फिर चालान भरेंगी,
सजनी की बलिहारी आँखें..


~अक्षिणी

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2022

अल्हड़ नदिया सा जीवन..

किन यादों की गठरी खोलें,
किन नावों के रस्से..
अल्हड़ नदिया सा जीवन अपना,
घट-घट गहरा सागर..

किन छोरों पे बंधन बांधें,
किन भावों पर पहरें..
कलकल कलता जीवन अपना
छलछल छलकी गागर..

किन मोहों की उँगली थामें,
किन छोहों के सदमे..
पल-पल दहका जीवन अपना,
रह-रह जलता उपवन..

~अक्षिणी

सोमवार, 17 अक्तूबर 2022

जाने क्या था..?

जाने क्या था..?
उड़ता कोई कागज का पुर्जा,
फिरता चलता यहाँ से वहाँ..

जाने क्या था..?
था भीगे किसी पायदान सा,
तिल तिल रिसता, घिसता हुआ..

दर्द क्या था..?
सपना सूना कोई बिखरा सा,
जलती किसी आँच में निखरा सा..

फर्क क्या था..?
झूठ था कि कोई सच था,
या कि बेबस बेचारा कोई बेजुबां..

हर्ज़ क्या था..?
सड़क पे लावारिस सा पड़ा,
फक़त चार काँधों की तलाश सा..

मर गया था..?
आदमी भर तो था..
आदमी शरीफ, कोई गरीब था..


अक्षिणी





शनिवार, 15 अक्तूबर 2022

हंगर इंडेक्स का सच..

जर्मनी की किसी एजेंसी ने वैश्विक भूख सूचकांक निकाला और भारत को 107वाँ स्थान दिया और भारत में मानो बिल्ली के भागों छींका टूटा।
क्या आप जानते हैं ये वैश्विक सूचकांक कैसे निर्धारित किए जाते हैं?
इनके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार होता है या ऑनलाइन गूगल फार्म भरवा कर तय किया जाता है..?
देखने वाली बात ये है कि इस ग्लोबल हंगर इंडेक्स में श्रीलंका(64),बाँग्लादेश(84) और पाकिस्तान(99) को भारत से ऊपर रैंकिंग दी गई है..
जबकि इन देशों की स्थिति हमसे छुपी नहीं है..
क्या कारण हो सकता है?क्या कारण है कि हर बार इन वैश्विक सूचकांकों के मामले में भारत पिछड़ा रह जाता है?
श्रीलंका और बाँग्लादेश बहुत हद तक भारत द्वारा दी गई सहायता पर निर्भर हैं,दवाओं के मामले में,खाद्यान्न के मामले में..आपदा प्रबंधन और सामरिक सहयोग के संदर्भ में भी..पाकिस्तान की तो ख़ैर क्या ही कहें..!
तो क्या आँकड़ों के प्रबंधन में ये तीनो देश हमसे बेहतर हैं..?
या इन सूचकांक एजेंसियों के प्रबंधन में हमसे आगे हैं?

कहाँ हैं हमारे डाटा विशेषज्ञ?
क्या उन्हें इन एजेंसियों के मानकों का पता है?
जिस एजेंसी ने यह गणना करवाई है उसे विभिन्न वैश्विक एनजीओ का समर्थन प्राप्त है।
ये एजेंसी कुपोषण, बाल मृत्यु दर आदि के मापदंड स्वयं तय करती है और उसी के आधार पर सूचकांक की गणना करती है। आइए इस पर चर्चा करें।एजेंसी के प्रतिमानों पर प्रतिदिन 1800 कैलोरी से कम खाद्य सामग्री ग्रहण करने वाले लोग भूखे और कुपोषित हैं..हमारे देश में अधिकांश लोग चपाती खाते हैं और एक सामान्य आकार की चपाती से औसतन सौ कैलोरी प्राप्त होती है..एक प्याज़ में चालीस कैलोरी और एक कटोरी दाल में 60-80 कैलोरी..अब यदि 1800 कैलोरी प्रतिदिन का लक्ष्य ले कर चलें तो केवल दाल रोटी पर जीने वालों को कम से कम बारह चपाती रोज छ: कटोरी दाल चार प्याज़ के साथ खानी चाहिए..कल्पना कीजिए..!
😳
इस आधार पर तो अपने राम भी कुपोषित हैं क्योंकि डायटीशियन 1200 कैलोरी से अधिक खाने ही नहीं दे रही..

फिर आती है बात बाल मृत्यु दर की..तो इन एजेंसियों के अनुसार भारत में पाँच साल से छोटे बच्चों की मृत्यु भूख से ही होती है..
क्या आप में से कितनों ने ऐसा देखा है कि बच्चा भूख से मर रहा हो और कोई उसे खाना न दे?
क्या आप ये बात मान सकते हैं?
इन पैमानों के अनुसार यदि किसी विशेष वय के बालक की कद इनके द्वारा तय किए गए स्तर से कम है तो वो भी कुपोषित ही कहा जाएगा..आनुवांशिकता इनके लिए अर्थहीन है..
इतना ही नहीं यदि वजन ज्यादा हो तो भी कुपोषित..!
एक और बात जो ध्यान देने योग्य है कि किसी अध्ययन के परिणाम इस बात पर भी निर्भर करते हैं आँकड़ों का स्त्रोत कितना व्यापक था?
कुल कितने लोगों और क्षेत्रों से आँकड़े लिए गए..?
क्या भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों से बात की गई?लब्बोलुआब ये कि चित्त भी मेरी, पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का..यानि प्रतिमान भी उनके और संगणक भी..जो चाहे लिख दो और उसे सही सिद्ध करने के लिए हमारा विपक्ष, मीडिया, हमारे फैक्ट चेकर तो है हीं..

*संगणक - computer
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने सन् 2020 में एक शोध करवाया जिसमें धनाढ़्य लोग भी कुपोषित कहे गए..

निष्कर्ष यह कि भूख की समस्या गंभीर है..समाधान का प्रयास तो करना हो मगर इसे भारत विरोधी प्रचार के पूर्व नियोजित प्रयास से अधिक न समझें..

🙏

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2022

आप बोलते अच्छा हैं..

आज किसी ने कहा ~ "हम बोलते बहुत अच्छा हैं..लिखते नहीं हैं..!"
आप ही बताइए लिखना क्यों है.. बोलने के लिए दिमाग में लिखना होता है..शब्द कहाँ से आते हैं..? 
भाव कहाँ से आते हैं..?
लिखने का अर्थ ऊलजलूल शब्दों की जमावट नहीं है..

बुधवार, 28 सितंबर 2022

समाचार दिवस..

आज विश्व समाचार दिवस है मित्रों..
चर्चा तो बनती है..
एक समय था जब समाचार लिए-दिए जाते थे यानि समाचारों से बहुत ही व्यक्तिगत सा नाता हुआ करता था जब शहर छोटे होते थे,गाँव घर जैसे हुआ करते थे।एक-दूसरे का हाल,गाँव-ढाणी की बात चौपाल पर ही हो जाया करती।विशेष समाचार घर पहुँचाए जाते थे।
पास-पड़ौस में जन्म-मृत्यु, ब्याह-शादी, ढोर-ढाँडों की बातें,लड़ाई-झगड़े सब सब तक पहुँच ही जाते थे।
समय बदला और आगमन हुआ हरकारों का जो यहाँ से वहाँ सूचनाएँ पहुँचाया करते,गाँव के बीचोंबीच किसी पेड़ के नीचे लोग इकठ्ठे होते और आस-पास समाचार सुनते-गुनते..हुक्के गुड़गुड़ाते और सो जाते..
बड़ा ही सीधा-सच्चा जीवन रहा होगा तब और तब के समाचार भी उतने ही सीधे-सच्चे।
फिर आगमन हुआ समाचार श्री का,समाचार पत्रों के माध्यम से।
परचे,खबरनामे,रोजनामचे छपते,लोग उन्हें स्वयं पढ़ते,औरों को सुनाते, किंतु सामाजिकता की स्थिति यह थी कि लोग समाचार पत्र भी साझे में मँगाते,समझदार जो थे।
फिर बेतार के तार ने समाचार के क्षेत्र में क्रांति ही ला दी।ऊँचे स्वर में रेडियो-ट्रांजिस्टर पर बजते समाचारों के साथ वेदव्यास,देवकीनंदन पांडे,रामानुज प्रसाद सिँह,हरि संधू,विनोद कश्यप,राजेंद्र चुघ हमारी चाय की चुस्कियों का हिस्सा बन गए..हर घंटे देश-विदेश के ताजा समाचार मिलने लगे..
जिन लोगों ने रेडियो पर समाचार सुने हैं वे ही उस श्रवणानंद को समझ सकते हैं..शब्दों से मानस में घटनाक्रम का दृश्य चित्र बनाना एक अनूठी अनुभूति कही जा सकती है। चुनाव समाचार हो या खेल समाचार या किसी प्राकृतिक आपदा की बात एक-एक शब्द को पकड़ मानो वहीं पहुँच जाया करते।
रेडियो ने समाचार प्रसारण पर बहुत लंबे समय तक एकछत्र राज किया फिर टेलीविजन समाचारों का प्रवेश हुआ और रेडियो और समाचारपत्र..दोनों की ही घंटी बज गई।दूरदर्शन की सौम्य,शालीन समाचार वाचिकाएँ आज भी हमारी आँखों में बसी हैं,अविनाश कौर सरीन, सलमा सुल्तान,ऊषा अल्बुकर्क,सरला माहेश्वरी..
तब समाचार आया करते थे..समाचारों के आगे-पीछे एक-दो स्पॉट विज्ञापन तो बजते पर समाचार विश्वसनीय हुआ करते,संवाददाता अलग होते,छायाकार अलग और समाचार वाचक अलग..समाचार वाचकों के मुखमंडलों पर भाव तो होते पर आवेग रहित..समाचार चाहे प्रुडेंशियल कप की जीत का हो या इंदिरा गाँधी की हत्या का..।
और अब..सब कुछ ब्रेकिंग न्यूज़ है..समाचार वाचक तो है ही नहीं..समाचार प्रस्तुतकर्ता है जो समाचार पर कम समाचार की भाव-भंगिमाओं पर अधिक कार्य करते हैं..शीघ्रता इतनी है मानों रेलगाड़ी छूटी जा रही..एक मिनट में सौ समाचार शंकर महादेवन के लोकप्रिय "श्वासरहित" की याद दिला देते हैं..।
संचार के आधुनिकतम संसाधनों के होते हुए भी समाचारों की विश्वसनीयता शून्यप्रायः सी हो गई है..समाचार प्रस्तोता समाचार कम अपने विचार अधिक बताते हैं जैसे कि जनता जड़मति है और समाचार की समझ ही नहीं रखती..!

समाचार को विमर्श का नाम दे कर आपसी तूतू-मैंमैं का प्रहसन बना दिया जाता है..विज्ञापनों के बीच किसी समाचार को पकड़ना फूस के ढेर में सुई ढूँढने जैसा है..मान लीजिए आपने खबर पकड़ भी ली तो आवश्यक नहीं वो सही ही हो..अब तो हाल यह है कि कहीं कोई खंडन नहीं आता..गलत-सलत सब परोस कर आगे बढ़ जाते हैं..खबर आफ्टर की पत्रावली में जा कर दब जाती है..कोई पूछने वाला नहीं..
खबर बनाने वाले से महत्वपूर्ण हो गया है खबर दिखाने वाला..और खबरिया चैनल नये जमाने के बाहुबली बन गए हैं..स्वयं के चन्द्रमुख सारी कलाओं को छोटे परदे पर देखने का नशा जनप्रतिनिधियों को समाचार समूहों का बंधक बना देता है..लिफाफा दो तो खबर छपे, खोखा दो तो खबर चले..
उस पर तुर्रा ये कि ये स्वयंभू समाचार समूह स्वयं को कार्यपालिका-विधायिका-न्यायपालिका से ऊपर कोई आसमानी ताकत समझने लगे हैं।आधे घंटे के विमर्श में ये लोग प्रथमदृष्टया वक्तव्य से लेकर सुनवाई, बहस सब कर निर्णय भी कर लेते हैं और सजा भी सुना देते हैं..
अगले समाचार तक आरोपी बदल जाता है..
समाचार अब Some-अचार भया,
प्रचार-प्रसार सब अतिसार हुआ..
समाचार की मौत,नया तमाशा रोज,
समाचार तो बचा कहाँ,सब व्यापार हुआ..

🙏

रविवार, 25 सितंबर 2022

लड़कियाँ..

लड़कियाँ धरती होती हैं..
जो सहेजती हैं..
पालती हैं, पोसती हैं..
देती हैं अपना..
रक्त-श्वास और मज्जा..
कि हो सके सृजन नया..
और चल पाए 
ये सृष्टि का चक्र सदा..
लड़कियाँ बीज नहीं होती..!
🙏
ये और बात है कि
अब बंजर हुआ चाहती हैं..
सृजन हुआ अब बंधन
ऊसर हो जिया चाहती हैं..
मुक्ति के नाम हो स्वच्छंद, उच्छृंखल गगन छुआ चाहती हैं..
तोड़ प्रकृति की सीमाएं अब अपनी शर्तों पर जिया चाहती हैं..

~अक्षिणी

शनिवार, 24 सितंबर 2022

पन्ना कागज का..

सुनता है मेरी, सहता है मेरी,
मुझ सा ही कहता है मेरी..
पन्ना कागज का..
बहता है मन जब, कहता है मन जब,
सुख-दुख के मोती, गहता है ये सब..
पन्ना कागज का..
अपना सा लागे, मन सा ये भागे..
बिरहा की रातें मुझ संग ये जागे..
पन्ना कागज का..
पन्ना कागज का..
चहका है कभी, दहका है बहुत,
खुशबू से मेरी बहका है बहुत..
पन्ना कागज का..

कल के सपने, कल के दुखड़े..
देखे सब, दिखलाए आज के दुखड़े..
पन्ना कागज का..
डरता ही नहीं, मरता ही नहीं..
जीवन से जी इसका भरता ही नहीं..
पन्ना कागज का..
पन्ना कागज का..

बुधवार, 14 सितंबर 2022

हैप्पी हिंडी डे..

-कहाँ से आ रही हो महारानी?
अँधेरा हो गया है
-बताते हैं भाई,साँस तो ले लें
-अच्छा जी
बड़ी बदली सी लग रही हो..
बालों में जूडा..
जूड़े में लाल गुलाब,
गालों पे रंगत..
होठो पे लाली..
माथे पे बिंदी का चाँद..
और ये दुशाला लाजवाब..
कहाँ से आ रही है सवारी?
-ओ हो तुम भी!
जल्दी है मुझे..
-जल्दी..?
अब कहाँ जाना है..?
अभी तो लौटी हो सुबह से..
-अरे भाई.. तुम समझती क्यों नहीं.. एक ही तो दिन होता है मेरी खुशी का..जब मेरी सभी संतानें मुझे याद करती हैं..
सच बड़ा अच्छा लगता है..
-ओ हो..फिर तो आज तुम्हें व्यस्त होना ही था!
-वही तो..चलो अब तैयार होने दो..
-अरे फिर से?
-हाँ तो..पड़ौस में नया कॉफी कोर्ट खुला है..
-मगर वहाँ तो अँधेरा ही अँधेरा..धुआँ सा उठता देखा है..
-वही..
-मगर तुम सठियापे में वहाँ क्या करने जा रही हो..बड़े जवान लड़के-लड़की आया करे हैं उधर तो?
-सठियापा नहीं,सत्तरयापा चल रहा है।1949 से गिनो..
-बदल दी न बात?
कहो क्या है वहाँ?
-कुछ प्यारे से बच्चों ने बुलाया है..गिट-पिट करके कुछ कह रहे थे..
-पर तुम वहाँ जा कर करोगी क्या? सुबह से मन नहीं भरा तुम्हारा फूल-मालाओं से? गोष्ठियों-संगोष्ठियों से?
-तुम तो पीछे ही पड़ जाती हो!प्यार से भला कभी किसी का पेट भरा है?
-प्यार?वही जिसके लिए बिसूरती रहती हो पूरे साल?
-सुनो अभी हो आती हूँ थोड़ी देर और सही,बेचारों ने प्यार से बुलाया है..
-और तुम तो हो भी मनुहार की कच्ची..
-सो तो है..देखो तो ये साड़ी ठीक से बँधी है..?
इसकी पाड़ ठीक से पड़ी है ना?
-अच्छी लग रही हो..वो मोतियों का हार भी डाल लो..
-नहीं,बड़ा पुराना है..ये डालती हूँ गारनेट वाला..
-और हाँ सुनो..देख तो आओ..कोई आया भी है या पिछली बार की तरह..?
-हम्म..। 
-अरे वहाँ तो बड़ा उत्सव सा सजा है..हो आओ..
--------

-अरे..लौट भी आईं?
कैसा रहा..?
-यूँ तो अच्छा ही रहा सब कुछ..
बच्चे गीत गा रहे थे..कुछ पुस्तकें भी पड़ी थीं यहाँ-वहाँ.. पर..
-पर क्या..?
-पर कुछ नहीं।बच्चों ने हिंदी डे मनाया,बोले..हैप्पी हिंदी डे आंटी जी..मैंने तीन ताली बजाई और लौट आई।
-ओह!
तो जाती क्यों हो..?
हर बार मुँह उतार कर आती हो..
-कैसे न जाऊँ?कैसे न मनाऊँ अपना दिन?इसी बहाने साल में एक बार दिनकर-नीरज-महादेवी-सुभद्रा जैसी मेरी संतानों को याद करते हैं लोग!
-यानि अबकी बार फिर जाओगी..?
-और नहीं तो क्या..?
बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम संस्कृत दिवस पर जाती हो..
और दुखी हो कर आती हो..
-आओ बहन..अपना दुख साझा करें..अपनी भाषा के फूल झरें..कभी हमारे भाग फिरें..

हैप्पी हिंडी डे मित्रों..🙏


गुरुवार, 25 अगस्त 2022

ईश्वर..

युगों-युगों से उठता आया 
प्रश्नों का सनातन स्वर है..
नर है नारी है नारायण,
या कि अर्धनारीश्वर है..
मुझ में रचता बसता है,
मुझ सा ही दिखता है,
मुझ सा ही मेरा ईश्वर है..

~अक्षिणी

बुधवार, 24 अगस्त 2022

जागो..

चाक सड़क के सीनों पर पैबंद लगाने वालों जागो..
जागो हे बिना सड़क के टोल उठाने वालों जागो..

नयी सड़कों में केबल का जाल बिछाने वालों जागो..
आए दिन खुदाई को कुदाल उठाने वालों जागो..

बरखा आती है..

हरे-भरे रूखों पर तलवार चलाने वालों जागो..
जागो हे वृक्षों की डाल कटाने वालों जागो..

जागो मिट्टी की मिट्टी में सेंध लगाने वालों जागो..
नद-नालों को पत्थर की पाट लगाने वालों जागो..
 
बरखा गुर्राती है..

फुटपाथों पर पक्की टाईल लगाने वालों जागो..
पीडब्लूडी टेंडर की फाइल लगाने वालों जागो..

नगरनिगम की खड़ताल
बजाने वालों जागो..
जागो हे बरसाती हड़ताल
कराने वालों जागो..  

बरखा चढ़ आती है..
जागो धरती का बोझ बढ़ाने वालों जागो..
जागो लाशों की नाव चलाने वालों जागो..

कब जागोगे..?
शहर समंदर बन आया जागो..
सब पानी-पानी हो आया जागो..

बरखा बढ़ आती है..

~अक्षिणी

अधिकारों की जय चाहो जो..

सोमवार, 22 अगस्त 2022

दोहे..

दुर्योधन सब सुयोधन भये,
निपट नोटन के संजोग..
नर-नारी सब रावण जपे,
धन कलजुगी महारोग..

~अक्षिणी

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

अपने हाथ..

अपना मन, अपने हाथ
मन की सोच अपने हाथ..
पराए बोल पराए जान
अपनी शांति अपने हाथ..

~अक्षिणी


सोमवार, 21 मार्च 2022

फिर आज कविता..

पन्नों की चुनर,
कहने का हुनर,
मनोभावों के उलझी तारों पर,
शब्दों की नावें सजी-धजी सी,
कठपुतली सी नाच उठी है
फिर..
आज कविता जाग उठी है..

महकी सी छुअन,
हल्की सी चुभन,
जाग उठे हैं सोये संवेदन,
झंकृत ज्यों अनगिन स्पंदन,
मनमचली सी नाच उठी है
फिर..
आज कविता जाग उठी है..

बातों की खनक,
रातों की धनक,

किससे जाने क्या कह जाए,
ठहरे-सहमे महके या बह जाए,
इक डफली सी बाज उठी है..
फिर..
आज कविता जाग उठी है..

आँखों में चमक,
पाँवों में घमक,
सपने लेकर लाखों के अमर,
तपने को जाने कितने हैं समर,
घन बिजली सी गाज उठी है..
फिर..
आज कविता जाग उठी है..

#कवितादिवस

~अक्षिणी

बुधवार, 16 मार्च 2022

मीरा..प्रेम रंग राची..

मीरा..
प्रेम रंग राची..

भई बावरी मतवारी,
डगर-डगर,
नगर-नगर नाची..
मीरा..
प्रेम रंग राची

श्याम चुनरिया,
ओढ़ बावरिया
प्रीत रंग राची..
मीरा..

मोहन मुरलिया,
सोभन सुरतिया
मूरत मन सांची
मीरा..
प्रेम रंग राची..

विष अमरत कर,
नाम सुमिरत बस
कृष्ण रंग राची..
मीरा..
प्रेम रंग राची..

~अक्षिणी

सोमवार, 14 मार्च 2022

कोचिंग कथा..

पड़ोस का कोचिंग सेंटर पुनः खुल गया है..माध्यमिक - उच्चतर माध्यमिक स्तर के बच्चों का स्वागत समारोह चल रहा है,रंग बरसे भीगे चुनर वाली.. की स्वर लहरी पर किशोर-किशोरियाँ गुरुजन के साथ थिरक रहे हैं..अभिभावक निश्चिंत हैं..एक्स्ट्रा क्लास चल रही है..
कोचिंग संस्थानों के लिए कोई आचार संहिता नहीं है।इन्हें किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि अतिमहत्वाकांक्षी माता-पिता स्वयं इन्हें प्रश्रय देते हैं।
स्कूल की मामूली फीस देने को पैसे नहीं हैं पर कोचिंग सेंटर पर चौगुनी फीस अग्रिम जमा करवा सकते हैं।
सारे साल कोचिंग सेंटर पर पढ़ने जा सकते हैं पर परीक्षा देने स्कूल नहीं आ सकते। कोरोना हो गया तो?
शिक्षा विभाग के कर्ता-धर्ताओं की भी मति भ्रष्ट हो गई है। परीक्षा के लिए ऑनलाइन विकल्प दिया जाए जी..
अरे भलेमानुसों..ऑनलाइन विकल्प उपलब्ध है तो कौन मूर्ख ऑफलाइन परीक्षा देगा?
कोरोना भी कमाल है..मॉल में नहीं होता..न पिक्चर हॉल में..न  मसूरी न नैनीताल में..न शादियों में न बैंक्वेट हॉल में..न स्टेडियम में न जिम-एक्जीबिशन हॉल में..
कोरोना होता है केवल स्कूल में इम्तिहान देते समय..
विचार कीजिए इस तरह बच्चों को सुविधाओं का दास, पिंजरे का रट्टू तोता बना कर क्या हम उनका भला कर रहे हैं..?
क्या वे सामना कर पाएंगे जीवन के संघर्षों का..?
कोई कोचिंग संस्थान जीवन जीने की कोचिंग नहीं देता..न कोई वन वीक सीरीज उपलब्ध है..न ही जीवन बहुवैकल्पिक वस्तुनिष्ठ प्रश्न पत्र है कि टिक लगाया और हो गया..
बच्चों के शुभचिंतक हैं तो उन्हें मजबूत बनाइए।
शॉर्टकट मत ढूँढिए..
समय दीजिए..

🙏

~अक्षिणी

सोमवार, 7 मार्च 2022

बेटी..

बात आधी हो के 
अधूरी हो कोई..
धीर की आस सी 
पूरी हो तुम..

स्वर्ग से उतरी हो के
चंद्र की कनी ही कोई
शाख पे खिलती हो के 
मिट्टी से बनी हो कोई 

साँच की ढाली हो के
आँच में ढली हो कहीं..
आग से जन्मी हो के
आब से जली हो तुम..

मिली जो नहीं मुझ से कभी 
अजन्मी वो बेटी हो कोई?
बलिदानों का प्रारब्ध
के बलिवेदी हो कोई,

शक्ति हो,सामर्थ्य हो के
श्रद्धा और सबूरी हो तुम..
माँ की आँखों की एक
आस अधूरी हो कोई..

ओस की बूँद सी
बर्फ सी धुली हो तुम..
मौन की धूँध में
नाद सी घुली हो तुम..

युगों-युगों से कर रही 
धरा को धन्य जो
जन्मों-जन्मो़ं से
त्याग की देवी हो तुम..


सभ्यता का आधार
संस्कृति की धुरी हो तुम..
गर्व हो तुम, मान भी
अर्घ्य की अंजुरी हो तुम..


~अक्षिणी

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

दुखःद..

9:30 am

ट्रिंग..
-हेलो..
-मेम आपका काल था..सॉरी मैं अभी उठा हूँ..
-जी..आज मनीत का प्रेक्टिकल था..आया नहीं वो..?
-आज था क्या..!!! ये आप वाइफ से बात कीजिए..
-साढ़े आठ बजे से चल रहा है सर..
-सॉरी मेम, उसने बताया ही नहीं..अभी उठा कर भेज दूँ?
-अब तो आधा खत्म हो गया,
मेडिकल भेजिए!

9:25 am

ट्रिंग..
-हेलो
-हाँ जी सर..राहुल कैसा है सर? एक्ज़ाम था आज..
अब तक लॉग इन नहीं किया उसने..
-अरे..आज एक्जाम था क्या..?
सुनो उठो तो..
-जी..
-अरे मेम..ये आप स्कूल वाले भी इतनी जल्दी एक्जाम रख देते हो,बच्चा उठा ही नहीं अब तक..
-साढ़े नौ बजे..जल्दी?

9वीं कक्षा

अगर ढूँढा जाए तो ऐसे अनेक उदाहरण आपको अपने आस-पास के शिक्षकों से सुनने को मिल जाएंगे..
कोरोना काल में आनलाइन क्लासरूम जब घर पहुँचा तो  शिक्षा और शिक्षण की गंभीरता मानो तिरोहित हो गई तिस पर शिक्षा बोर्डों और सरकारों के लोकलुभावन क्रियाकलापों ने करेला नीम चढ़ा कर दिया।

यूक्रेन में भारत सरकार द्वारा सुरक्षित निकास उपलब्ध कराए जाने पर भावी चिकित्सकों की छिछली प्रतिक्रिया देख कर मन विचलित हुआ..
क्या आपको नहीं लगता है कि हम सबने चीजों को सहज लेने के फेर में उनकी गंभीरता ही कम कर दी है..?

सब चलता है..!

जब तक हाथ में मोबाइल है, कान में ईयरप्लग, तन पर कपड़े, पेट भरा और सोने के लिए बिस्तर..सब चलता है..
इनमें से किसी में भी थोड़ी सी कमी हो जाए तो पहले माता-पिता को कोसेंगे, फिर सरकार को कोसने सड़क पर उतर आएंगे,एहसास होगा कि बच्चा कोई भावना भी रखता है अन्यथा मशीनी जड़मानव..

ऐसा लगने लगा है कि हमारे देश के बच्चे केवल प्रत्युत्तर में विश्वास रखने लगे हैं..किसी ने कुछ कहा उसका "काउंटर" आवश्यक है..वो भी मजाहिया..
परिहास होना चाहिए..अर्थ और मान का कोई महत्व कहीं  नहीं..कहीं बात नीची न  रह जाए..बिना सोचे-समझे केवल अगले को निरुत्तर करना ही लक्ष्य है..

अपना आराम और सुविधा ही अहम है,बिस्तर पर लेट कर पढ़ने के अभ्यस्त जो हो गए हैं।
माता-पिता ने कम्प्यूटर, लेपटॉप,फोन,इंटरनेट दिला कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है।बच्चा कमरे मैं बंद है..भोजन,पानी,नाश्ता पहुँच जाता है और बालगोपाल भीतर लॉगइन से उपस्थिति दर्ज कर इंद्रजाल में गुम..।
बोर्ड भी क्या करे..?
उसे भी अपनी दुकान चलानी है..!
शिक्षा विभाग की अपनी मजबूरियाँ हैं..!
निजी स्कूलों की अपनी सीमाएं..
और शिक्षकों का तो रब ही राखा..!

जिनकी सबसे अधिक हानि है वे अभिभावक वाट्सएप ग्रुप बना कर शॉर्टकट ढूँढने में लगे हैं।जीवन में हर जगह असफल रहे लोग अभिभावक संघों के अध्यक्ष बन बैठे हैं और बच्चों के बहाने अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।
क्या सरकार,क्या स्कूल,क्या बोर्ड,शिक्षक सब पर दबाव बनाने में लगे हैं..

इधर समाचारपत्रों की तो पहचान ही है जलती में हाथ सेंकने की..
आखिर पत्रकारों के लिए स्कूल एडमिशन का कोटा जो नहीं है..!

फीस माँग रहे हैं?
फेल कर दिया!
खाली कापी पे 4 नंबर ही दिए?
रुक अभी खबर लेता हूँ 
तेरे स्कूल की..!
रिपोर्टर का फोन नं देना
अभी लगाता हूँ
तेरी टीचर की वाट..!

क्या सिखा रहे हैं आप बच्चे को?
नुकसान किसका?
विचार कीजिए..
स्कूल में बच्चा दस बारह साल रहेगा,आप के लिए तो जीवन भर..

🙏

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

कमाल है..

कमाल है..
वे लिखते हैं तो
क्रांति..
और मैं कुछ लिखूँ तो
बस भ्रांति..?

ये कैसी सोच है..?
वे मुझे गरियाएं तो
उनकी स्वतंत्रता..
मैं प्रत्युत्तर भी दूँ तो
मेरी असहिष्णुता..

ये कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है..?
वे झंडा उठाएँ तो
वे असंतुष्ट भर हैं..
मैं झंडा उठाऊँ तो
फसादी हो जाता हूँ..

ये कैसी समानता है..?
वे अपना बचाव करते हैं,
क्योंकि वे बेचारे हैं..
मैं अपना बचाव करता हूँ तो
मैं हिंसक, आक्रामक..?

ये कहाँ का न्याय है?
मेरे विश्वासों को चुनौती देते हैं
तो वे धर्मनिरपेक्ष हैं..
उनकी सोच पर मेरे संदेह,
तो मैं सांप्रदायिक हो जाता हूँ..?

ये कैसी पंथनिरपेक्षता है..?
वे कुछ भी कह सकते हैं,
सहिष्णुता से छला जो गया हूँ..
मैं उन पर अंगुली नहीं उठा सकता,
सद्भाव का ठेका जो लिया है मैंने..

ये कैसी सद्भावना है..?
वे उफ् भी जो करें,
बड़े पापा संज्ञान लें..
मैं थानों पर ठोकर खाऊँ
प्राथमिकी हाथ में ले..

ये कैसी व्यवस्था है..?
उचित-अनुचित सब 
उनके विशेषाधिकार हैं..
मेरा सर धड़ पे टिका
ये उनको अस्वीकार है..

ये कैसा संविधान है..?
वे मेरे घर में,
मेरे सर पे सवार हैं..
हो कर मालिक भी, 
बेघर बेचारा,लाचार हूँ..

कैसे ये देश मेरा, मेरा विधान है..?

~अक्षिणी

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

कहो ईश्वर..!

कहो ईश्वर!
कैसे साध लेते हो असाध्य ये जीवन-मृत्यु का अनुक्रम?
कैसे थाह पाते हो प्रकृति के मौन स्वरों का व्यतिक्रम?
कैसे भेद पाते हो ज्वालामुखी से विकराल कहकहों का क्रम
 कहो कैसे बाँध पाते हो कलकल का कलरव.. 
हैं चकित देखते सदैव,
उत्तंग पर्वतों के तुंगश्रृंग..
कहो अनंत!

कहो वसुंधरे!
कैसे धार लेती हो 
हिमनग सा ये धीर अगाध?
कैसे गाध लेती हो 
हिमनद सी ये पीर अथाह?
कैसे बाँध पाती हो 
जननी तुम ये स्नेह अपार? 
कहो कैसे सह पाती हो 
निज छाती पर बारंबार प्रहार?
किस विध गह पाती हो 
निज थाती पर घात-आघात?
कहो कैसे पी जाती हो सब गरल प्रवाह?

कहो शस्यश्यामले!

~अक्षिणी

कविताएँ हम तक चल कर आएँ..

कभी किसी ने कहा था,
"कविताएँ मुझ तक चल कर आती हैं।"

मन रंजित कर 
भंजित कर तंद्राएँ
मुझको व्योम नये ले जाएँ..
आभासों-अनुभावों के
अभिप्राय नये दिखलाएँ..
कविताएँ हम तक चल कर आएँ..
मन स्मृत-विस्मृत कर
तन झंकृत अनहद कर
अनुप्रास नये सिखलाएँ..
कविताएँ हम तक चल कर आएँ..

अक्षिणी

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

कि तुम कभी पुकार लो..

उसी डगर ठहर गए,
कि तुम कभी पुकार लो,
पुकार कर दुलार लो,
दुलार कर सँवार दो..

वहीं कदम ठहर गए,
कि फिर वही दयार हो,
राहत-ए-दयार जो के चाह दे,
चाह कर सँवार दो..

वहीं नज़र बिछा दिए,
कि तेरी राह में गुज़ार हो,
चाहत-ए-गुज़ार का करार हो, 
इकरार कर करार दो..

यूँ मुड़ के मोड़ मुड़ गए,
कि फिर वही बहार हो,
बहार जो कि प्यार हो,
या प्यार की फुहार दो.. 

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

हे मसिजीवियों..

हे मसिजीवियों..
नये भारत की नई ललकार लिखो
नयी क्रांति अब नया यलगार लिखो..

नये भारत के नव प्रतिमान लिखो..
नये भारत का अभिनव विधान लिखो

पिछड़ों को हुलराओ,दुलराओ
हाँ अगड़ों को अपराधबोध न दो

जिसमें आरक्षण की छाप न हो
जिस पे संख्याबल की थाप न हो

काटो नहीं बाँटो नहीं,चापो न हमें
छाँटो नहीं आँटो नहीं,नापो न हमें

नई नफरत की नस्लें न उगाओ,
नये वर्गों नये पंथों में छापो न हमें

थम जाओ अब आगे की बात कहो
हे मसिजीवियों 
नये भारत की नई ललकार कहो

शस्य श्यामला नव धरती का आह्लाद लिखो
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला का आशीर्वाद लिखो..
लोहितशोणित पोषित इस वसुंधरा का,
सुनो अब तुम आह्वान अनुनाद लिखो..

लिखो..अब नया कुछ निर्माण लिखो,
कलम उठाओ, नव आल्हा नव प्राण लिखो
स्वाधीन भारत का नूतन गौरवगान लिखो..

हे मसिजीवियों

हाँ भार बहुत है तुम्हारे शब्दों पर
उत्तरदायित्व बड़ा तुम्हारे भावों पर
लिखो..
सद्य लेखनी से अपनी नव प्रकाश लिखो..

नये भारत की नई ललकार लिखो
नव क्रांति अब नया यलगार लिखो..

~अक्षिणी