सोमवार, 13 अगस्त 2018

क्यूं हैं..

क्या बताएं के परेशां क्यूं हैं..
हम तो हैरां हैं कि ज़िंदा क्यूं हैं..

अक्षिणी

रविवार, 12 अगस्त 2018

नया भारत..

नई उमंगें,नई तरंगे,आह्वान नये हैं
नव भारत के अभिमान नये हैं..

गुंजित हो सब जल थल अंबर,
आल्हादित हो जन गण का मन ..

निजता का अधिकार नया हो
नारी का सम्मान नया हो..

आरक्षण का अवसान तुरत हो,
सब रक्षण से उत्थान नया हो..

नई ऊर्जा है, नई उर्वा है
नव सृजन के विज्ञान नये हो

नये भारत के निर्माण नये हो,
अब प्रगति के प्रतिमान नये हो..

72वें स्वतंत्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाएं..

अक्षिणी

शनिवार, 11 अगस्त 2018

एकाकी छोर..


आजाद पतंग सा एकाकी ,
छितरे से तागे संग गूँधा मन  ..
और इस धागे के तमाम सिरे
तुम तक पहुंचते हैं गाहे बगाहे
और उलझा जाते हैं मेरी
सोच की गुत्थियों को कुछ और..
बना जाते हैं नये सिलसिले,
खोल जाते हैं कोई नया छोर..
तुम सो जाओ, तुम खो जाओ..
इन पर चलता नहीं कोई जोर..

अक्षिणी

मौसम की शाखों पर..

मौसम की शाखों पर
यादों के झूमर
बादल की बाहों में
खुशियों की झालर
सावन के हाथों से
सजती धरती पे
हरियाली की चादर
इन्द्रधनुष के स्वप्निल
रंगों सी ज़िंदगी तू
बहुत खूबसूरत है..

मौसम की शाखों पर
यादों की कश्ती..
बूँदों की सरगम पर ,
चाहों की मस्ती..
भीगी बरखा संग
बातों की बस्ती..
और एक अदद,
चाय की चुस्की..
खूबसूरत है ज़िंदगी..

अक्षिणी

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

वो बादलों के फाहे..

संजो कर रखे वो बादलों के फाहे
अक्सर उभर आते हैं गाहे-बगाहे
तकते रहते हैं बहानों की राहें
भिगो जाते हैं ढाढ़स की बाहें

हल्की सी आहट पे बरस जाएं,
यादों की झिरमिर को परस जाएं
भीतर बाहर सब तर कर जाए
तकियों के गिलाफों की पनाहें

दिन के उजाले ज़रा न चाहें,
दर्द की रस्मे रात की छाहें..
सुख की थपकी दुख की आहें
मन के रिश्ते ये खूब निबाहें

संजो कर रखे वो बादलों के फाहे
अक्सर उभर आते हैं गाहे-बगाहे..

अक्षिणी

सोमवार, 6 अगस्त 2018

अच्छे दिन..

एक बार एक चूहा था..
चूहे को लाल मखमल का एक टुकड़ा मिला...
वो मखमल का टुकड़ा ले कर दर्जी के पास गया, बोला मेरी सुंदर सी टोपी सिल दो..
दर्जी ठठाकर हँस पड़ा..बोला अब ये दिन आ गए हैं..चूहे भी टोपी पहनने लगे हैं..और वो भी मुझसे सिलवा कर..?
चूहा बोला..आखिर यही तो हैं....
दर्जी ने कहा-नहीं सिलता.. जा जो बनता है कर..
चूहा बोला-
राजा के पास जाऊँगा ,
चार सिपाही लाऊँगा
सोलह डंडे पिटवाऊँगा
मैं खड़ा खड़ा तमाशा देखूँगा..
दर्जी डर गया और टोपी सिल दी..
चूहा टोपी पहन कर इठलाने लगा...

बस टोपी क्या मिली चूहे का दिमाग दौड़ने लगा.भागा भागा गोटे वाले के पहुँचा,बोला ऐ गोटेवाले जरा मेरी टोपी में सितारे लगा दो.
गोटे वाले ने कहा-किस फालतू दर्जी ने सिली है ये?मैं नहीं लगाने वाला.भाग यहाँ से.
चूहा बोला-दिल्ली के दर्जी ने सी है.सितारे लगा वरना राजा के पास जाऊँगा...
राजा के पास जाऊंगा ,
चार सिपाही लाऊँगा
सोलह डंडे पिटवाऊँगा
मैं खड़ा खड़ा तमाशा देखूंगा..
गोटे वाला क्या करता सितारे लगा दिए..
सितारों वाली लाल टोपी लगा कर चूहा सीधे राजा के घर पहुँचा,बोला-ऐ राजा,
ये गद्दी मेरी है.अब मैं राज करूंगा.
राजा ने कहा - अच्छा..टोपी पहन ली तो राजा हो गया..दिल्ली वाला समझा है क्या? भाग यहाँ से..
अब तो चूहा बिफर गया..वहीं पसर गया..
राजा ने उसे झरोखे में बिठा दिया.
आते जाते लोग देखते और कहते..
ये देखो टोपी वाला चूहे के अच्छे दिन आए हैं..
टोपी वाले चूहे की शान देख शहर के सारे चूहों ने अब गठबंधन कर लिया है.सब के सब लाल मखमल का टुकड़ा ढूंढ रहे हैं..हरा गोटा हाथ में ले कर..
क्या इनके अच्छे दिन आऐंगे...?
अच्छे दिन..😂

अक्षिणी

अपनी भी कहानी..

अपनी भी कहानी कुछ ऐसी है..
यादों के आँचल में अटकी
बातों के छल्लों जैसी है,
बादल की बाहों में उड़ते फाहों जैसी है..
इस पल मेरे पास कहीं
तो उस पल तेरे साथ सही..
खट्टी मीठी इमली के चटखारों जैसी है..

अपनी भी कहानी कुछ ऐसी है,
छाली में छनती राखों जैसी है,
काली सी रात में सांपों जैसी है,
तुझको मुझको छू जाएगी,
प्याली में चाय की भापों जैसी है..

अक्षिणी

फिर एक बार

यूपी के एक्सप्रेस वे पर बिखरा
सपा के सच का सीमेंट
बंगाल की सड़कों पर टीएमसी
की गृहयुद्ध की धमकी
यहाँ वहाँ हाथ पैर मारती काँग्रेस
के घोटालों का चिठ्ठा
शिवसेना का शांति दूतों को
आरक्षण  का सब्ज़बाग
यदि यही विपक्ष के हालात हैं तो
2019 में मोदी फिर एक बार है

अक्षिणी

वाह री ज़िंदगी..

वाह री ज़िंदगी तू भी,
गज़ब की तरंग है..
बदलती मौसमों से रंग है..

वाह री ज़िंदगी तू भी,
गज़ब की दबंग है..
मचलते हौसलों की जंग है..

वाह री ज़िंदगी तू भी,
अजब एक पतंग है..
पलटती डोरियों से तंग है..

अक्षिणी

वाह री ज़िंदगी तू भी,
मस्त एक मलंग है..
डूबते साहिलों के संग है..

जागो..

जागो और भागो,
सो कर किसने कुछ पाया है..
धूप को जिसने अपनाया,
साथ उसी के चलती छाया है..

शमशीर उठाओ,
कर्मयुद्ध का घोष है आया..
जयगीत उसी के बनते आए,
वक्त से जो लड़ता आया है..

अक्षिणी

बोलती खामोशियाँ..

बोलती खामोशियाँ हैं ,
उम्र की मदहोशियाँ हैं ,
मिलती नहीं अब तो कहीं,
खो गई सरगोशियाँ हैं..

बोलती खामोशियों से कुछ लोग,
कुछ ना कह कर सब कह जाते हैं..

अक्षिणी