शनिवार, 22 जून 2019

एकाकी..

प्रेम में पराजित हुई नारी
त्याग देती है खुशियाँ सारी
बदल जाती है नागफनी में
ओढ़ लेती है
विषैले काँटों का अभेद्य आवरण..

खो देती है वाणी से कोमलता नारी सुलभ
जीती है भीतर बाहर
बस एकाकी बन
निस्पृह निर्भेद्य सदैव
नर मरीचिका से दूर ।

अक्षिणी

शुक्रवार, 14 जून 2019

बरसात के टोटके..

बात गरमी की रोज निकलती है,
बरसात की चाह भी तड़पाती है..
बादल भी तैरते से लुभाते हैं मगर..
ये मौसम है कि बस में नहीं आता..

आदमी बहुत कुछ साध चुका है मगर अभी भी बहुत कुछ उसकी शक्ति के परे है..बरसात भी एक ऐसी ही मृगतृष्णा है..
हमारे देश की बात करें तो वैदिक काल से ही वर्षा को साधने की कोशिश की जाती रही है..कभी यज्ञ से तो कभी हवन पूजन से..तो कहीं राग मेघ मल्हार से वर्षा का आवाहन किया जाता रहा है..जलदेवता वरुण एवं बरसात के देव इन्द्र का आराधन किया जाता रहा है..
बरसात बुलाने के टोनो और टोटकों का तो कहना ही क्या.देश के हर हिस्से में अलग अलग हैं.बंगाल में मेंढकों की बड़ी धूमधाम से शादी कराई जाती है.अभी कल परसों ही ऐसी एक शादी सुर्खियों में थी. तमिलनाडु और केरल में केले के पेड़ों का ब्याह कराया जाता है कि इंद्र देव प्रसन्न हों..
मध्य भारत में बरसात बुलाने के लिए कागज़ की कश्तियाँ जलाशयों में तैरायी जाती हैं..कहीं कहीं कपड़े की गुड़ियाएँ बना कर उनका विवाह भी कराया जाता है..
राजस्थान में कपड़े की गुड़िया को बाँस पर बाँध कर गीत गाते हुए पानी में विसर्जित किया जाता है..किसान सूखे खेतों में सामूहिक गोठ करते हैं और गीत गाकर वर्षा को बुलाते हैं.. देवा मेघ दे, मेघ दे, पाणी दे,गुड़धानी दे..
 गुजरात में टिटहरी को ढूँढा जाता है..कहते हैं कि यदि टिटहरी अंडे दे देती है तो बरसात आने वाली है..मोर का बोलना तो खैर बरसात के आने की सुनिश्चित पूर्व सूचना है..
अथिरात्रम् भी ऐसी ही 4000 वर्ष पुरानी याज्ञिक परंपरा है जिससे वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है..आधुनिक काल में इसे तीन बार संपन्न किया गया है..1975 में पंजाल, 1990 में कुन्डूर और 2006 में किजाक्कनचेरी में ...पाश्चात्य वैज्ञानिकों एवं शोध संस्थानों के तत्वावधान में ..
लेटिन अमेरिका में किसान खुले आसमान के नीचे खड़े हो कर गैब्रियल एवं पोसैडन को प्रसन्न करने के लिए मंत्रोच्चारण करते हैं वहीं उत्तर अमेरिका के कुछ कबीले आज भी वर्षा नृत्यों का आयोजन करते हैं.चीन में वर्षादेव यिंग लोंग को रिझाने के लिए ड्रैगन डाँस किया जाता है..
थाईलैंड का एक मजेदार किस्सा है एक बार जब बहुत दिनों तक बरसात नहीं आई तो लोगों ने परंपरानुसार एक जीवित बिल्ली को विभिन्न पवित्र स्थानों की यात्रा करवा कर वर्षादेव को मनाने की सोची..किंतु पशु प्रेमी लोगों के डर से उन्होंने असली बिल्लीकी जगह एक खिलौना बिल्ली लेने की सोची.
आखिर में डोरेमोन की शक्ल की खिलौना बिल्ली की मदद से यह कार्य संपन्न किया गया.. बरसात अभी तक नहीं आई है..😆 क्या आप कुछ अलग करते हैं बरसात को बुलाने के लिए..? हमें बताइए..

अक्षिणी

ज़िक्र-ए-सवाल..

किसी को फ़िक्र-ए-जवाब ने मारा,
कोई बेचारा ज़िक्र-ए-सवाल से हारा..

अक्षिणी

पत्रकार..

उम्र भर बजाते रहे कोर्निश ये जनाब,
कहलाते रहे दरबारी पत्रकार..
आखिर अब याद आया इन्हें दस्तार,
जब सड़क पे आ गए इनके सरकार..

अक्षिणी

भेड़िये हो गए हैं हम..

आखिर कहाँ चुके हैं हम,
कि वहशी हो गए हैं हम..
आदमी के नाम पर लानत
गिद्ध भेड़िये हो गए हैं हम..

हाय री मुई चाय..

हाय री मुई चाय,
अब ये मुझे जरा न भाए..

बस अभी ही छोड़े हैं..
पतले होने को दौड़े हैं..

चाय की लत मोहे ऐसी लागी,
छ: कप रोज पीती थी अभागी..

वजन पचहत्तर हुआ तो जागी,
चाय छोड़ अर ग्रीन टी पे आगी..

पेट ढोलकी हुआ है ऐसे,
मास नौवां पूरा हो जैसे..

गर्दन दिखती लठ्ठों जैसी,
बोडी हो गई पठ्ठों जैसी..

दोनों भुजाएं जो हुईं बलशाली,
छोड़ के टी ग्रीन टी अपना ली..

अक्षिणी

आज भी..

हम आज भी आहें भरते हैं,
उस चाँद की चाहें करते हैं..
परियों के सपन में जीते हैं,
तारों की चाहत में मरते हैं..
हाँ आज भी मेंढक
राजकुँवर बन जाते हैं..
हाँ आज भी हमको,
जादुई सपने भाते हैं..

अक्षिणी

वाह री ममता..

वाह री ममता बिन ममता की,
जरा न सुनती क्यूँ जनता की..

डाक्टर से ये खार है खाए,
गुंडों को ये खूब बचाए..

भारत इसको जरा न भाए,
रोहिंग्यों को गले लगाए..

ये ना बोले बोली समता की,
इसे लहर लगी बस सत्ता की..

लगता है अब नाश है आया,
बुद्धि विवेक से हाथ छुड़ाया..

अक्षिणी

बुधवार, 5 जून 2019

शिखर तक..

हाँ तुम शिखर तक जाना,
शीर्ष पर ध्वज फहराना..
नभ का आँचल छू जाना,
फिर लौट नींव को आना..

चट्टानों में राह बनाना,
पर्वत से तुम ऊँचे जाना..
सूरज से भी आँख मिलाना,
फिर लौट नीँव को आना..

तुफानों में शीश उठाना,
सपने सारे सच कर जाना..
धरती माटी नहीं भुलाना,
लौट के फिर तुम नींव को आना..

अक्षिणी