मंगलवार, 21 सितंबर 2021

मनुज लाँघते कितने अँबर..

अभिलाषाओं-आकांक्षाओं के कितने भूधर
लेकर अपने हिय के भीतर
मनुज लाँघते कितने अंबर
कितने सरित-गिरी और गह्वर
कितने कंटक-सुमन और शर
धूप-घाम-घन पानी पत्थर
जल-थल-नभ सब छू कर
मनुज लाँघते कितने अँबर
कितने सागर कितने भँवर
मनुज ठानते कितनी टक्कर..

~अक्षिणी



निवृत्ति..

तुष्टि से तृप्ति, संतुष्टि से संतृप्ति..
प्रवृति से निवृत्ति ही प्रगति..

~अक्षिणी