उजियारों के कांधों पर
अंधियारों के कर्ज़ हैं भारी,
धूप न हो तो छांव न महके
शाम नहीं तो सुबह बेमानी..
अक्षिणी
उजियारों के कांधों पर
अंधियारों के कर्ज़ हैं भारी,
धूप न हो तो छांव न महके
शाम नहीं तो सुबह बेमानी..
अक्षिणी
आधी हो या पूरी हो ,
सुखी हो या गीली हो
रंग के जलवे क्या कहिए,
लाल हरी या पीली हो..
इस की पूड़ी और पकौड़ी ,
इसकी बर्फी इसकी कचौड़ी
इसके आगे सब फीके,
ऐसी है ये स्वाद की कौड़ी..
आधी रोटी जब मिल जाए,
मानुस इसको लेने धाए..
ये न गले तो बात न बनती,
पीते जाएं धापे धपाए..
स्वाद ये देखो बढ़ कर बोले,
मा की हो या मखनी
जादू इसका चढ़ कर बोले,
पुरबी हो या दखनी
दाल जले या दाल गले,
इसके तड़के बनें बराती
इसके दामों तख्ते पलटे,
इसके भड़के कुरसी जाती
दाल का दर्शन जो भी जाने,
दाल दाल को वो पहचाने..
#DalDivas
अक्षिणी
इस शोख कलम को क्या कहिए?
रुकते झुकते चल जाती है,
मौज़ों में मेरी हंस देती है,
आँसू में मेरे ढल जाती है..
बदबख़्त कलम के क्या कहिए
भावों सी मचल जाती है,
चाहों सी बहक जाती है पन्नों पर,
राहों सी उलझ जाती है...
खुशबू सी बिखरती है हर्फों में
यादों सी महक जाती हैं..
सीधी सच्ची सह लेती है..
लाख बरज लो इसको पर,
मन की सनकी सब कह जाती है..
अक्षिणी
खत्म हुआ इंतजार अब,
है जीने का अधिकार अब
थे जी रहे गुमनाम से,
थी ज़िंदगी बेकार ये
ज्यों नाव बिन पतवार के,
डोलती थी मँझधार में..
ज्यों डोर बिन आकाश में,
एक कटी पतंग हो उड़ान में..
अब मिली पहचान हमको,
जी रहे थे निराधार अब तक..
है नई पहचान अपनी..
है अस्तित्व का उपहार ये
है बहुत आभार तुमको,
जो दे दिया आधार हमको ..
जीत का हथियार हमको,
जीने का आधार हमको..
अक्षिणी
दोस्ती मुमकिन नहीं है 'मैं' के मारे,
वक्त के मोहताज हैं साथ सारे इन दिनों..
नींद के आगोश में हैं ख्वाब सारे,
चाहतें चुप सी खड़ी हैं हाथ बाँधे इन दिनों..
चल चलें, छोड़ आएं प्रीत के गीत सारे,
मन को यूँ चुभने लगे हैं मीत सारे इन दिनों..
धूप को मिलती नहीं अब छाँव कोई,
ज़िंदगी आसां नहीं है इस किनारे इन दिनों..
-अक्षिणी
निशानेइश्क इस ताज में दफन कई राज़ हैं,
वो मुहब्बत ही क्या जो ताज की मोहताज है..
अक्षिणी
तुझे याद कर रहे हैं,
तेरी बात कर रहे हैं,
ना मिले ना सही ज़िंदगी,
तेरे बगैर बसर कर रहे हैं..
#ज़िंदगी
तेजोमय हो,स्वस्तिमय हो,
घर आँगन सब ज्योतिर्मय हो
अंधियारों को दीप्त करे
धनधान्य भरे,अंतर्तम् को दूर करे
यह दीपोत्सव मंगलमय हो..
अक्षिणी
दिल्ली के मालिक,
चप्पल छाप बिगड़े नवाब,
आम आदमी का झंडा,
ले कर आए थे आप..?
भूल गए..?
दिल्ली के सरकार ज़रा होश में आएं आप,
ये दिल्ली है जनाब ठरकी सुलतान.
किसी एक की हुई न कभी,
कई आए राजा राजे या बादशाह..
दिल्ली के मालिक,
ज़रा होश में आएं आप
आहिस्ता बोलें झूठों के सरदार,
कहीं सुन ना लें असली सरकार
#दिल्ली_मालिक
अक्षिणी
झूठे दिखावटी लोग,
मतलबी बनावटी लोग..
बस दूर से अच्छे लगते हैं,
ये नकली सजावटी लोग..
अक्षिणी
आप बेकार..
केजू मक्कार..
झूठी सरकार..
दिल्ली बेजार..
रोए लगातार..
बस कर यार..
दिल्ली सरकार..
गिन कर बंदे चार..
आधे तिहाड़..
आधे लफ्फाड़..
हद है यार..
कैसी सरकार..
अक्षिणी
संग तेरे संग से ढल जाते तो
जमाने कई होते,
हम तेरे रंग में रंग जाते तो
फसाने कई होते..
अक्षिणी ..
चाहों को ये स्वर दे ऐसे,
मनोभावों को वर ले जैसे..
बोलों को ये वाणी कर दे,
भीगी आँख से पानी हर ले..
सपनों में ये रंग भरे और,
वचनों से ये दंग करे यूं..
हर भाषा को अपनाए ऐसे,
सखियों संग इठलाए जैसे..
हिन्द का गौरव गान है हिन्दी,
हर हिन्दी का अभिमान है हिन्दी..
#हिन्दी_दिवस
सच है कि दीवारों के कान हुआ करते हैं,
जो सुन सुन कर हलकान हुआ करते हैं..
दीवारों के कान बड़े बेईमान हुआ करते हैं,
सबसे ज्यादा ये परेशान हुआ करते हैं..
दीवारों के कान कितने हैरान हुआ करते हैं,
झूठी-सच्ची लगा कर सम्मान लिया करते हैं..
दीवारों के ये कान..
ना कभी किसी पे मेहरबान हुआ करते हैं,
इनके न कभी कोई भगवान हुआ करते हैं..
दीवारों के कान
बेचारे कितने नादान हुआ करते हैं,
सबसे पहले यही कुर्बान हुआ करते हैं..
अक्षिणी
वो जो राम और रहीम हुआ चाहते थे,
आदमी हो नहीं पाए ख़ुदा हुआ चाहते थे..
झूठी आस्था के अंधे ये लोग,
देश का दामन दागदार किये जाते हैं,
मनुष्य नहीं बन पाए जो लोग,
उन्हें भगवान किए जाते हैं..
आज फिर देश का दामन शर्मसार हुआ है,
आज फिर चली हैं गोलियाँ अपनों पर..
फिर लग गया है एक और प्रश्न चिन्ह,
समृद्ध और खुशहाल भारत के सपनों पर..
अक्षिणी
मैं तृषित और तुम कृपण युगों-युगों से,
कैसे देख पाओगे नेह दृगों के..
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..
साक्षी संदर्भ हैं प्रीत क्षणों के,
कैसे गाओगे वो गुंजित गीत मनों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी
जो मुग्ध हो गुम तुम स्वयं पर यों,
कैसे देख पाओगे छू कर मन को?
तुम रहने दो...
तुमसे मोहब्बत न हो पाएगी...
क्यों कर समझोगे दर्द दियों के,
हो बंधक तुम अंश-हरों के
कैसे प्रीत निभा पाओगे?
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी..
उलझे रहते हो अंकों शब्दों में
बेरहम चांदी के टुकड़ों में
कैसे समझोगे मन छंदों के
तुम रहने दो..
तुमसे मोहब्बत ना हो पाएगी ..
अक्षिणी
मुफ्त नहीं है
आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं,
सनद रहे..
कितनी माँओं ने थे लाल गँवाए,
कितने वीरों ने थे प्राण गँवाए..
इस आजादी की वेदी पर,
अनगिन हमने शीश चढ़ाए..
सनद रहे..
कंधों ने था जोर लगाया,
फंदों ने था जोश जगाया..
रक्त बहा जब दरिया हो कर,
तब जाकर हमने आजादी पाई
बातों से कब आजादी आई ?
ये याद रहे..
जीत अभी ये आधी है,
संघर्ष अभी भी बाकी है..
भारत वीरों,अब हम होश में आए
अनमोल ये आजादी खो ना जाए..
ये ध्यान रहे..
अधिकारों की बात करें जब,
कर्त्तव्यों को याद करें हम..
साथ जुटें और साथ बढ़ें अब..
फिर नया हिन्दुस्तान बनाएं..
भारत को फिर महान बनाएं..
सनद रहे..
अक्षिणी
मुफ्त नहीं हैं आज़ाद हिन्द की आज़ाद हवाएं
सनद रहे..
अधिकारों के साथ कर्त्तव्य ना हम भूल जाएं,
सनद रहे..
ये आज़ादी मुफ्तख़ोरों के लिए नही हैं,
सनद रहे..
ये आज़ादी किसी एक धर्म या सम्प्रदाय की नहीं है,
सनद रहे.
ये आज़ादी हमारी कम और आने वाले पीढ़ियों की ज्यादा है,
सनद रहे..
दहलीज पे आज भी राह तकती हैं जो निगाहें,
आने की कह वो लौट ना पाए..
सनद रहे..
फूल मस्तक के शहीदों ने चढ़ाए,
तब कहीं हम आज़ाद हो पाए..
सनद रहे..
अक्षिणी
मन मेरा स्तब्ध खड़ा है,
निष्ठुर ये प्रारब्ध बड़ा है..
पीर मैं अपनी दिखलाऊं कैसे,
टीस ये मन की कह पाऊं कैसे..
लालों में वो लाल था ऐसे,
गालों में ज्यों गाल हो जैसे..
देख के उसको मन ऐसा जागा,
बाँध लिया फिर मोह का धागा..
हाथों से नहलाया उसको,
पोरों से सहलाया उसको..
महका करता था घर भर में,
अटका रहता था मेरी नजर में..
हाय री किस्मत लूटा ऐसा,
हाथ किसी का छूटा जैसे..
उसकी छवि को भूल न पाऊं,
कण कण में मैं ढूंढ न पाऊं..
बीज बीज वो ऐसा छूटा,
वो लाल टमाटर ऐसा फूटा..
अक्षिणी
प्रसंगवश: सुदामा को घोर विपन्नता की स्थिति में भी कृष्ण स्मरण करने पर उनकी पत्नि के प्रश्न का उत्तर..
कृष्ण कृष्ण जो जपत हो तुम,
कुछ समझाओ ये कृष्ण कौन..?
री भोली तू कृष्ण न जानि,
निरी बावरी तू कृष्ण ना जानि..
कर्म हैं, धर्म हैं प्रभु कृष्ण सदा,
धर्म का मर्म है प्रभु कृष्ण सदा..
मनमोहनी अधरों पर मुस्कान कृष्ण के,
सब जानत हैं भगवान कृष्ण हैं..
मन में बसी जो प्रीत कृष्ण की,
जग में चली जो रीत कृष्ण की..
सब ग्वालों में बालकृष्ण हैं,
हर युग अर्जुन के साथ कृष्ण हैं..
राधा का श्रृंगार कृष्ण से,
उद्धव का संसार कृष्ण हैं..
गोकुल के गोपाल कृष्ण तो
मथुरा के भगवान कृष्ण हैं..
कर्ता हैं कृष्ण और काम कृष्ण हैं,
हैं मूल कृष्ण तो प्रतान कृष्ण हैं..
कुंज गलिन में धेनू का संगीत कृष्ण हैं,
यमुना तट पर वेणू का गीत कृष्ण हैं..
री बावरी कृष्णमय संसार सारा ,
कण-कण में प्राण का आधार कृष्ण है..
अक्षिणी