हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष के चतुर्थ मास आषाढ़ की पूर्णिमा को महर्षि व्यास की जन्म तिथि होने के कारण व्यास पूर्णिमा कहा जाता है।
वही व्यास जिनके हम ॠणी हैं वेदों को हम तक पहुँचाने के लिए।यदि उन्होंने पाँच हजार वर्ष पूर्व वेदों को पुनः नहीं रचा होता तो हम खो चुके होते चारों वेदों का ज्ञान जो सृष्टि के आरंभ से दिया गया था। इसीलिए उन्हें सर्वोच्च गुरु "वेद व्यास" कहा गया और उनकी जन्मतिथि को गुरु पूर्णिमा।
वो दिन जो शाश्वत ज्ञान के दान का प्रतीक है।
यह त्योहार पारंपरिक रूप से हिंदू,बौद्ध और जैन धर्म में अपने आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन हेतु मनाया जाता है।
पूर्णिमा होने से यह एक गुरु द्वारा अपने शिष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर उद्यत करने का प्रतीक भी है।
गुरु" शब्द "गु" व " रु"दो शब्दांशों से मिल कर बना है जिनका अर्थ है अंधकार और प्रकाश..
गुरु अर्थात् वह जो अंधकार को हरता है।यहाँ अंधकार का तात्पर्य अज्ञान, भ्रम और असत्य विश्वासों से है।
इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।
~अक्षिणी
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