मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

कमाल है..

कमाल है..
वे लिखते हैं तो
क्रांति..
और मैं कुछ लिखूँ तो
बस भ्रांति..?

ये कैसी सोच है..?
वे मुझे गरियाएं तो
उनकी स्वतंत्रता..
मैं प्रत्युत्तर भी दूँ तो
मेरी असहिष्णुता..

ये कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है..?
वे झंडा उठाएँ तो
वे असंतुष्ट भर हैं..
मैं झंडा उठाऊँ तो
फसादी हो जाता हूँ..

ये कैसी समानता है..?
वे अपना बचाव करते हैं,
क्योंकि वे बेचारे हैं..
मैं अपना बचाव करता हूँ तो
मैं हिंसक, आक्रामक..?

ये कहाँ का न्याय है?
मेरे विश्वासों को चुनौती देते हैं
तो वे धर्मनिरपेक्ष हैं..
उनकी सोच पर मेरे संदेह,
तो मैं सांप्रदायिक हो जाता हूँ..?

ये कैसी पंथनिरपेक्षता है..?
वे कुछ भी कह सकते हैं,
सहिष्णुता से छला जो गया हूँ..
मैं उन पर अंगुली नहीं उठा सकता,
सद्भाव का ठेका जो लिया है मैंने..

ये कैसी सद्भावना है..?
वे उफ् भी जो करें,
बड़े पापा संज्ञान लें..
मैं थानों पर ठोकर खाऊँ
प्राथमिकी हाथ में ले..

ये कैसी व्यवस्था है..?
उचित-अनुचित सब 
उनके विशेषाधिकार हैं..
मेरा सर धड़ पे टिका
ये उनको अस्वीकार है..

ये कैसा संविधान है..?
वे मेरे घर में,
मेरे सर पे सवार हैं..
हो कर मालिक भी, 
बेघर बेचारा,लाचार हूँ..

कैसे ये देश मेरा, मेरा विधान है..?

~अक्षिणी

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

कहो ईश्वर..!

कहो ईश्वर!
कैसे साध लेते हो असाध्य ये जीवन-मृत्यु का अनुक्रम?
कैसे थाह पाते हो प्रकृति के मौन स्वरों का व्यतिक्रम?
कैसे भेद पाते हो ज्वालामुखी से विकराल कहकहों का क्रम
 कहो कैसे बाँध पाते हो कलकल का कलरव.. 
हैं चकित देखते सदैव,
उत्तंग पर्वतों के तुंगश्रृंग..
कहो अनंत!

कहो वसुंधरे!
कैसे धार लेती हो 
हिमनग सा ये धीर अगाध?
कैसे गाध लेती हो 
हिमनद सी ये पीर अथाह?
कैसे बाँध पाती हो 
जननी तुम ये स्नेह अपार? 
कहो कैसे सह पाती हो 
निज छाती पर बारंबार प्रहार?
किस विध गह पाती हो 
निज थाती पर घात-आघात?
कहो कैसे पी जाती हो सब गरल प्रवाह?

कहो शस्यश्यामले!

~अक्षिणी

कविताएँ हम तक चल कर आएँ..

कभी किसी ने कहा था,
"कविताएँ मुझ तक चल कर आती हैं।"

मन रंजित कर 
भंजित कर तंद्राएँ
मुझको व्योम नये ले जाएँ..
आभासों-अनुभावों के
अभिप्राय नये दिखलाएँ..
कविताएँ हम तक चल कर आएँ..
मन स्मृत-विस्मृत कर
तन झंकृत अनहद कर
अनुप्रास नये सिखलाएँ..
कविताएँ हम तक चल कर आएँ..

अक्षिणी

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

कि तुम कभी पुकार लो..

उसी डगर ठहर गए,
कि तुम कभी पुकार लो,
पुकार कर दुलार लो,
दुलार कर सँवार दो..

वहीं कदम ठहर गए,
कि फिर वही दयार हो,
राहत-ए-दयार जो के चाह दे,
चाह कर सँवार दो..

वहीं नज़र बिछा दिए,
कि तेरी राह में गुज़ार हो,
चाहत-ए-गुज़ार का करार हो, 
इकरार कर करार दो..

यूँ मुड़ के मोड़ मुड़ गए,
कि फिर वही बहार हो,
बहार जो कि प्यार हो,
या प्यार की फुहार दो.. 

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

हे मसिजीवियों..

हे मसिजीवियों..
नये भारत की नई ललकार लिखो
नयी क्रांति अब नया यलगार लिखो..

नये भारत के नव प्रतिमान लिखो..
नये भारत का अभिनव विधान लिखो

पिछड़ों को हुलराओ,दुलराओ
हाँ अगड़ों को अपराधबोध न दो

जिसमें आरक्षण की छाप न हो
जिस पे संख्याबल की थाप न हो

काटो नहीं बाँटो नहीं,चापो न हमें
छाँटो नहीं आँटो नहीं,नापो न हमें

नई नफरत की नस्लें न उगाओ,
नये वर्गों नये पंथों में छापो न हमें

थम जाओ अब आगे की बात कहो
हे मसिजीवियों 
नये भारत की नई ललकार कहो

शस्य श्यामला नव धरती का आह्लाद लिखो
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला का आशीर्वाद लिखो..
लोहितशोणित पोषित इस वसुंधरा का,
सुनो अब तुम आह्वान अनुनाद लिखो..

लिखो..अब नया कुछ निर्माण लिखो,
कलम उठाओ, नव आल्हा नव प्राण लिखो
स्वाधीन भारत का नूतन गौरवगान लिखो..

हे मसिजीवियों

हाँ भार बहुत है तुम्हारे शब्दों पर
उत्तरदायित्व बड़ा तुम्हारे भावों पर
लिखो..
सद्य लेखनी से अपनी नव प्रकाश लिखो..

नये भारत की नई ललकार लिखो
नव क्रांति अब नया यलगार लिखो..

~अक्षिणी

रविवार, 5 दिसंबर 2021

सत्ता की जात..

इनके कपड़ों पर तंज बनते हैं,
उनके बंगलों की बात होती है,
मुद्दे सारे वहीं कहीं रहते हैं
रंगे सियारों की बात होती है..

कभी राम को गाली देते हैं,
कभी नाम पे ताली देते हैं,
बाँध के धोती मंदिर-मंदिर
जनेऊधारी की बात होती है..

इनको धर्मों के ताने पड़ते हैं,
उनको मज़हब की लात पड़ती है..
मौका दिन ही बदल देता है,
हर रात सुहागरात होती है..

इनकी डिग्री पे उँगली उठती है,
उनकी बिक्री पे मात होती है..
लोग उम्मीद नहीं रखते अब,
एक सत्ता की जात होती है..

राजनीति के हाल चंगे हैं,
कुर्सी पे सब लाल नंगे हैं..
सीधी-उल्टी वो चाल चलते हैं,
जनता रोज हलाल होती है..

~अक्षिणी

बुधवार, 17 नवंबर 2021

रुदाली..

वो तमाम किस्से जो मेरे बाद कहे जाएंगे
जो आज वो कह जाएं तो क्या बात हो

वो तमाम गुंचे जो मेरी अर्थी पे उछाले जाएंगे
जो आज वो महक जाएं तो क्या बात हो

वो तमाम कसीदे जो मेरी मैयत पे पढ़े जाएंगे
जो जीते जी वो कह पाएं तो क्या बात हो

वो तमाम रुदालियाँ जो मेरी खातिर गाई जाएंगी..
वो जीते जी मेरे साथ गुनगुनाएं तो क्या बात हो..

वो तमाम लोग जो मेरी मौत पे आएंगे
जो आज वो मिल जाएं तो क्या बात हो..

~अक्षिणी