रविवार, 12 मार्च 2017

फागुन

रुत आई है देखो फागन की,

रंग खेलन की, रस बरसन की,
रस लूटन की, मन हरसन की,
तन रंगन की, मन रंजन की,
मनमोहन छवि नंदनंदन की,
रुत आई है देखो फागन की.

हाथ गुलाल जो श्याम लिये हो ,
लाल गुलाब सों गाल किये हों.
फाग उड़े फिर राग रचे,
राधा के संग जो श्याम सजे.
रुत आई है देखो फागन की..

टोरी चले जब लरिकन की,
गारी पड़े फिर गोपियन की.
होरी मचे इन गलियन में तो,
बोली उड़े फिर लठियन की.
रुत आई है देखो फागन की..

तन नर्तन की , मन हरसन की..
रस लूटन की , रंग बरसन की..
रुत आई है देखो फागन की.

अक्षिणी 

शनिवार, 11 मार्च 2017

मृगतृष्णा..

मृगतृष्णा सा मेरा जीवन,
ढूंढे तुझको मेरे भगवन्.

मोह माया के छूटे कंगन,
तेरी शरण सब मेरे भगवन्.

ये जन्मों के झूठे बंधन,
तुझ से जुड़े अब मेरे भगवन्.

अक्षिणी भटनागर

गुरुवार, 9 मार्च 2017

सब कुछ संभव है..

हाँ मैंने यह बचपन से जाना है,
मूर्खों से मुझको ना बतियाना है.
हाँ प्रश्न तुम्हारा बचकाना है पर,
अब उत्तर मुझको समझाना है.
इस भारतभू पर हे मूढ़मतै,सब कुछ संभव है..

जहाँ अध्धों-पव्वों मे चुन जाते नेता,
और बन जाती हो सरकारें.
जहाँ रक्षा सौदों में हो जाते हों समझौते,
और बिक जाती हों तलवारें.
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै,सब कुछ संभव है..

जहाँ दिग्विजय ही दिशाहीन हो,
सठियाने में ब्याह रचाते हों .
जहाँ नब्बे की उमर में बौराए हो,
नेता मंत्री बाप बन जाते हों .
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै,सब कुछ संभव है..

जहाँ तुम जैसे डकार जाते हो,
कन्हैया की अभिलाषाओं की सैंवय्याँ,
और बेशर्मों से चटखार जाते हो,
मेहर की महत्वाकांक्षाओं के घेवर.
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै,सबकुछ संभव है..

जहाँ बूढ़े बच्चों को बहलाने में तुम,
हो जाते हो नतमस्तक.
जहाँ राजमाता और राजपुत्र,
विदेश में मनाते हों उत्सव.
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै, सब कुछ संभव है..

जहाँ चुनाव आयोग महीनों तक,
देश को रख लेता हो बंधक.
जहाँ चारे,तोप मशीनों तक,
बाड़ों को भी खा जाते हों रक्षक.
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै, सबकुछ संभव है..

इस मातृभूमि के यश गौरव के,
तुम भी तो सौदाई हो.
मातृभूमि के उत्थानपतन के,
तुम भी तो उत्तरदायी हो.
उस भारतभू पर हे मूढ़मतै, सबकुछ संभव है..

अक्षिणी भटनागर

तेरी जय हो..

साम दाम भय भेद के परे
मेरे ईश्वर तेरी जय हो.

मेरे सच सब तू जाने और
मेरे भ्रम सब तेरे भ्रम हो.

मेरे दुख अब तेरे दुख हैं,
मेरे सुख स्वर तेरी लय हो.

मेरी चाहें तुझ तक पहूंचे,
मेरी सांसे तेरी मय हो.

मैं हारूं तो तू हारे और,
तेरी जय में मेरी जय हो.

मेरे वंदन तुझको अर्पण ,
मेरा मन अब तेरा दर्पण हो.

अक्षिणी भटनागर

मंगलवार, 7 मार्च 2017

हर दिन तेरा हो..

उन्मुक्त हो तुम,मनमुग्ध हो,
खुशियों भरा हर स्वर तेरा हो.
नारी हो तुम, जी लो जी भर,
खिलता महका हर दिन तेरा हो.

अक्षिणी भटनागर

रहने दो..

लौटा दो वो मुस्कानें
जो छीनी तुमने देवी कहकह
जीने दो मुझे मानवी बन कर
रहने दो अब पूजन अर्चन.

मन चाहे अब नेह का आँचल,
खुलने दो सब मान के बंधन.
देवी है ना महारानी ये,
रहने दो अब ये सम्बोधन.

जीने दो मुझे मिट्टी बन कर,
नहीं चाहती मैं ऊँचे आसन.
उड़ने दो अब पाखी बनकर,
रहने दो अब झूठे चंदन.

जी सकती हूँ अपने बल पर,
रहने दो अब जन्मों के बंधन.
है मान मुझे अब अपने पर,
रहने दो ये रिश्तों के बंधन.

अक्षिणी भटनागर

बुधवार, 1 मार्च 2017

नापाक कोशिश..

सयाने हो गये हैं जो लोग सब,
बच्चों को बहकाने की कोशिश है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
झुनझुना फिर हाथ में है.
मुल्क की मुख़ालफत का
सबक फिर पाठ में है.

जल गई हैं मशालें बगावत की,
फिर मुल्क को जलाने की कोशिश है.

चुभ रहा है कुछ आँखों को,
वतनपरस्ती का जुनून.
अरसा हो गया है बस्तियों में,
उजड़ा नहीं  सुकून.

कई दिनों से मायूस सी है सियासत,
कोई कन्हैया उगाने की कोशिश है.

मासूम निगाहों में सज गये हैं,
खुशियों के मंजर.
नन्हें हाथों में दिखते नहीं हैं,
नफरत के खंजर.

ज़ुबानें ढूंढ रही है नये तराने
ख़िलाफत के गीत गाने की कोशिश है.
संभल जाओ मुल्क के निगहबानों,
बच्चों को बरगलाने की कोशिश है..

अक्षिणी भटनागर