बुधवार, 27 जनवरी 2021

ये कैसी आज़ादी है..?

ये कैसी आज़ादी है?
74साल बाद भी हम अपनी-अपनी अलग पहचान का झंडा लिए खड़े हो जाते हैं,अपने अधिकारों का परचम लिए हर तीसरे दिन देश को आँखें दिखाने लगते हैं.
हमें न अपने राष्ट्र की परवाह है,न राष्ट्रीय पर्व का लिहाज,ना ही अपने राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए हमारे मन में कोई सम्मान..!
ये कैसी आज़ादी है?
इतने शर्मनाक कृत्य के बाद भी लोग अपनी तुच्छ राजनीति से बाज नहीं आते..
कृषि बिल विरोध के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए किसानों को भड़काने का काम भी तो हमारे ही कुछ अपनों ने किया..!

ये कैसी आज़ादी है?
किसी भी नियम की अनुपालना हम स्वेच्छा से नहीं करते.
यातायात का नियम हो या कर कानून हम उनकी अवहेलना कर गर्व करते हैं.
स्वच्छ भारत के विरोध में हम पटरियों पर शौच करने बैठ जाते हैं.
क्यों हम अपने देश को अपना नहीं समझते और बाहर वालों की बातों में आ जाते हैं?

ये कैसी आज़ादी है?
सरकारी संपत्ति को हम अक्षरशः अपनी समझते हैं और गाहे-ब-गाहे उसे तोड़-फोड़ कर अपना क्रोध व्यक्त करते हैं..
रेल हो, बस हो, या सड़क सब का उपयोग और दुरुपयोग हम अपना अधिकार समझते हैं..

ये कैसी आज़ादी है?
किसान आंदोलन को ही लीजिए..
विरोध समझ आता है किंतु क्या ट्रैक्टर रैली आवश्यक थी?
क्या सिद्ध करना चाहते थे..?
कि आप अपनी चुनी हुई सरकार से ज्यादा ताकतवर हैं?
क्या आप अपने ही देश की सरकार को पूरे संसार के सामने शर्मसार करना चाहते थे?

ये कैसी आज़ादी है?
और विरोध प्रदर्शन के नाम पर लालकिले पर आपका शर्मनाक कृत्य किसानों के प्रति सहानुभूति को जन्म देगा?
आप तो समझदार होने का दावा करते थे?
यदि इस अराजकता से आपका कोई संबंध नहीं है तो आप साथ क्यों खड़े हैं?

ये कैसी आज़ादी है?
"जय जवान जय किसान" का क्या हुआ?
शर्म नहीं आई जब आप लोगों ने पुलिस कर्मियों पर हाथ उठाया?
वे पुलिस कर्मी जो राष्ट्र की सेवा में सन्नद्ध थे?
क्या हासिल हुआ?
राजनेताओं को तो अपनी रोटियाँ सेंकनी
हैं किंतु आप उन की बातों में कैसे आ गए..?

ये कैसी आज़ादी है?
पूछिए एक बार स्वयं से..आज़ादी का पचहत्तरवाँ साल द्वार पर खड़ा है..
क्या हम पात्र हैं इस आज़ादी के लिए?
क्या हम समझते हैं अपना उत्तरदायित्व?
क्यों हम भीड़ के साथ भीड़ बन खड़े हो जाते हैं और झंडे के डंडे से ही झंडे की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला देते हैं..?

ये कैसी आज़ादी है?
इस मुगालते में न रहे कि इस सब से आपके आंदोलन को कोई लाभ होगा.
दिल्ली पुलिस ने आपको अनुमति दी. आपने उनकी बात रखी?
यदि नहीं तो किस मुँह से सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं?
प्रश्न तो उठेंगे,उठेंगी उंगलियाँ आप पर.
क्षमा करिए अन्नदाता जी,दलालों के हाथ खेल गए आप..!

~अक्षिणी 

धन्य हो अन्नदाता..

जलियाँवाला पूछ रहा है लाल किले से रोकर हाल,
कितने नाशुक्रे निकले देखो अपने ही पेट के लाल..

डायर के फायर से भारी अपने अपनों की मार,
बिन गोली के हुआ है छलनी सीना अबकी बार..

लाल किले की लज्जा लूटी,प्राचीर पे किया वार,
गणतंत्र दिवस का अपमान किया,तिरंगा लिया उतार..

बारूद लगा कर भाग छूटे हैं नकली नक्सल यार,
आज नहीं तो कब गाजेगी आखिर कानूनी तलवार..

माटी के माथे पर मल गए ये कैसा भीषण काला दाग,
भारत की छाती पर दल गए देखो ये नफरत की दाल..

तलवार भांजते जो निकले उनको कह दूँ कैसे मैं जय किसान,
भूखे रहना मंजूर मुझे नहीं चाहिए ऐसे अन्नदाता किसान..


~अक्षिणी 




गुरुवार, 7 जनवरी 2021

लड़ना होगा..

सहज सदा नया कुछ कर जाना,
नयी नींव पर मंजिल कर जाना..
सुधार कोई सरल नहीं है जग में,
कठिन बहुत बिगड़े को बनवाना..

सब जंजीरें तंत्र की जंग लिए होंगी,
कड़ियाँ अटकी,भटकी,उलझी होंगी..
जलना होगा तुझको, तपना होगा,
सरल नहीं होगा लोहे को पिघलाना..

अड़ना होगा तुझको,लड़ना होगा,
अपनी हर बात पर डटना होगा..
हारना मत तुम बस चलते जाना,
बाधाओं को साध तुम बढ़ते जाना..

~अक्षिणी 

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

नव वर्ष..

              अभिनंदन नववर्ष का..
              नव वर्ष है, नव हर्ष हो..

                   प्रतिध्वनियाँ भय की हों विगत,
                   विस्मृत हों विपदाएं विकट
                   आशंकाएँ निर्मूल हों  समस्त,
                   जागृत हों अभिलाषाएँ नूतन..
              
                           हो आगत का स्वागत..
                           नव वर्ष है, नव हर्ष हो..
                     

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

ये कशमकश क्यूँ..

तू ही बता ए ज़िंदगी,बेइंतिहा तू बेरहम
ये कशमकश क्यूँ 
चैन-ओ-सुकूं, ओ मुस्कुराहटों से बेसबब
ये रंजिश क्यूँ 
तू ज़िंदगी ना मेहरबां, ना खुशनुमा,
ना ख़्वाब सी तू
तुझे जीने की मुसलसल ये जद्दोजहद 
हरगिज़ क्यूँ..

~अक्षिणी 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

कविता क्यों ..

           जो स्पर्श ना करे
           जो प्रश्न ना करे
           तो कविता क्या

                                     
                                        जो द्वंद्व ना कहे
                                        जो स्वछन्द ना बहे
                                        तो कविता कैसी

          
           जो उद्विग्न ना करे
           जो उल्लास ना भरे
           तो कविता क्यों 

                                       
                                       जो आस ना भरे
                                        जो त्रास ना हरे
                                        तो कविता कहाँ

          
          जो श्वास ना ले
          जो विश्वास ना दे
          तो कविता कौन..

                                       
                                        जो दृश्य ना रचे
                                        अदृश्य ना सृजे
                                        तो कविता कैसे..

           
           जो सत्य ना कहे
           जो स्वप्न ना गहे
           तो कविता क्यों

                                      
                                       जो प्रसंग ना गुने
                                       जो निसर्ग ना बुने
                                       तो कविता क्यूँकर

              ~अक्षिणी

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

अक्सर ख़ुद को ..

दुनिया के रंग में रंग नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
अपनी किसी तरंग में जिए जाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
शहद झूठ का लपेट नहीं पाते है,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
भीतर-बाहर जुदा हो नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
दोहरा चरित्र कभी जी नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..

~अक्षिणी