सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

अनजान बन जा..

दूर कोई रो रहा है
धैर्य अपना खो रहा है
हिचकियों के साथ
अंतिम साँस कोई ले रहा है
शून्य से आवाज़ आई
मोम से पाषाण बन जा
जान कर अनजान बन जा
मगर कब तक?
है जरूरी कि आज तू संगीन हो
संधान बन जा
वज्र हो अग्नि बाण बन जा
सब्र तज
मौत की मशाल बन जा.
रुद्र सम
फिर शत्रुओं का काल बन जा.

अक्षिणी



#नमन
जाने कितने लाल ये लील गया कश्मीर,
पाण चढ़ाओ बाण को,जीत लो कश्मीर..

शांति..

आत्मसम्मान न हो तो कोई क्रान्ति नहीं होती,
मरघट की शान्ति कभी शान्ति नहीं होती..

घिरे हुए सिंह का आर्तनाद सुन काँपते हैं प्राण मित्र,
ठहरो जरा, होने को है आतताइयों का त्राण शीघ्र ..

अक्षिणी

परिवर्तन..

परिवर्तन एक शाश्वत सत्य है..
जो इसे स्वीकार नहीं करते ,
इसके अनुसार नहीं ढलते,
शनै: शनै: लुप्त हो जाते हैं..
अपना अस्तित्व खो देते हैं..
परिवर्तन ही प्रगति है,
जो बदलते नहीं..
जड़ हो जाते हैं..
ठहरे पानी की सी,
सड़ांध मारने लगते हैं..

राम तुम्हें फिर आना होगा..

हे राम तुम्हें फिर आना होगा,
नव संकल्प उठाना होगा..
यह कलयुग भी दायित्व तुम्हारा है,
इसको भी पार लगाना होगा..
देखो कितने रावण उग आए हैं,
दानव के वंशज मानव बन आए हैं..
नई सीता को अपनाना होगा,
हे राम तुम्हें फिर आना होगा..
देखो कितनी आँखें सूनी हैं
कैकेयी की मंथरा से संधि है
कौशल्या को धीर बँधाना होगा..
हे राम तुम्हें फिर आना होगा..
कितने केवट व्याकुल हैं..
कितनी प्रतीक्षाएँ पत्थर है?
सबका भार उठाना होगा
हे राम तुम्हें फिर आना होगा..

~अक्षिणी

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

जो अभावों में पले..

जो अभावों में पले और,
चाँद को माँगा किए..
आँधियों में जो खिले और
धूल में महका किए..

जो धूप को तरसा किए,
और छाँव को चाहा किए..
धुर अँधेरों से लड़े जो,
इक दीप हाथों में लिए..

वक्त की सख़्ती ने देखो,
स्वप्न मंजिल के जगाए..
डूबती कश्ती ने जिनको,
ख़्वाब साहिल के सजाए..

छूटते यूँ बेबसी में,
हो गए सपने पराए..
लूटते यूँ बेकसी में ,
दर्द के अपने ये साए..

जो धूप को तरसा किए,
और छाँव को चाहा किए..

ढूँढते जो पत्थरों में,
जीत के आखर सुनहले..
गूँजते कातर स्वरों में,
धूल के पल्लव नवेले..

जो धूप को तरसा किए,
और छाँव को चाहा किए..

टूटती उम्मीद को अपनी
अब वो दें सहारे..
रूठती तकदीर को अपनी
अब वो ख़ुद सँवारें..

जो धूप को तरसा किए,
और छाँव को चाहा किए..

अक्षिणी

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

वक्त यूँ ..

जो वक्त यूँ गुज़र गया तो क्या रह जाएगा,
सिलसिला हो दरगुज़र,हादसा रह जाएगा..?