शिकंजी उदयपुरी..
शनिवार, 13 नवंबर 2021
Children's Day
Hues of Bright and Right
Cues of Light and Might
Fuse together to form
The beautiful spectre of life
That we call a child
With a touch of wild..
Happy Children's Day to the balls and bundles of positive energy..
Akshini
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021
कब तक..?
कब तक..?
कब तक टालोगे..
कब तक..?
कब तक राह तकोगे..?
कब तक..?
कब तक चुप रहोगे..?
कब तक..?
कब तक बस करोगे..?
और तमाशा कब तक..?
घोर निराशा कब तक..?
इन दामों नहीं हमें स्वीकार..
करना होगा अब प्रतिकार..
कब तक..?
~अक्षिणी
दशहरा..
किस बात का दशहरा?
नपुंसकों की जय है
नरभक्षियों का समय
न राम ने आना
न रावण का मारा जाना
न गीता का गान कहीं
न सीता का मान कहीं
रावण तो रावण
पुतला तक न जला पाना
न देवियों को चिंता कोई
न देवों का जग से नाता
किस बात का जय घोष?
कैसा धर्मक्षेत्र?
कैसा धर्मयुद्ध?
किस बात का दशहरा?
~अक्षिणी
अन्नदाता हैं जी..
अन्नदाता हैं जी..
रास्ता रोकेंगे
बसें जलाएंगे
भिंडरावाले की जय करेंगे
कारें तोड़ेंगे
सर फोड़ेंगे
लाल किले को मटियाएंगे
तारें काटेंगे
तिरंगा उतारेंगे
सिपाही को धकियाएंगे
जनता को लतियाएंगे
हाथ काट कर लटका देंगे
लालच में अर्थी उठवा देंगे
हे राम!
कब तक अन्नदाता कहे जाएंगे?
~अक्षिणी
दुहाई..
है अगर ये अपनी सरकार तो
पराई क्या होगी?
राजधानी में उठ रहा यलगार तो
दुहाई क्या होगी?
भड़कने दी जो आग,अब
कड़ाई क्या होगी?
पाल लिए बाहों में साँप,
लड़ाई क्या होगी?
उठ रही नासूर से सड़ांध,
दवाई क्या होगी?
भलाई से खा रहे मात,
बुराई क्या होगी..?
~अक्षिणी
मंगलवार, 21 सितंबर 2021
मनुज लाँघते कितने अँबर..
अभिलाषाओं-आकांक्षाओं के कितने भूधर
लेकर अपने हिय के भीतर
मनुज लाँघते कितने अंबर
कितने सरित-गिरी और गह्वर
कितने कंटक-सुमन और शर
धूप-घाम-घन पानी पत्थर
जल-थल-नभ सब छू कर
मनुज लाँघते कितने अँबर
कितने सागर कितने भँवर
मनुज ठानते कितनी टक्कर..
~अक्षिणी
निवृत्ति..
तुष्टि से तृप्ति, संतुष्टि से संतृप्ति..
प्रवृति से निवृत्ति ही प्रगति..
~अक्षिणी
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