शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

खबर नहीं है..

कुछ भी नहीं बचा है सब ख़ाक हो चला है,
हर सूं बिखर गए हैं उनको ख़बर नहीं है..

अक्षिणी 

हम तुम..

हैं साथ मगर दूर हम तुम,
अपने अपने दायरों में गुम..

हैं साथ मगर हैं  दूर दूर,
गो ख़ुदी के नशे में चूर चूर..

अक्षिणी 

बज़ाहिर..

बज़ाहिर प्यार का दुनिया में जो अंजाम होता है,
कोई मजनूँ,कोई हाकिम,कोई गुलफाम होता है..

अक्षिणी 

तेरी याद चली आई..

फिर वही मुश्किल है सरे शाम,
तेरी याद चली आई..

हुई कातिल है ये महफिल तमाम,
तेरी याद चली आई..

तुम न समझोगे मेरे अहसास,
तेरी याद चली आई..

कैसे उतरेगा ये वहशी तुफान,
तेरी याद चली आई..

फिर से जागे हैं वही अरमान
तेरी याद चली आई..

कैसे भूलेंगे ये तेरा अहसान,
तेरी याद चली आई..

कितनी महँगी थी वो पहचान,
तेरी याद चली आई..

बिखरे बिखरे हैं मेरे जज्बात,
तेरी याद चली आई..



अक्षिणी

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

जी..

न ढूँढ अक्स किसी और के,
खुद आईना बन के जी..
यूँ नक़्श मंज़िलों के भूल के,
तू रास्ता बन के जी..

अक्षिणी 

सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

मानवर..

हम पूछते हैं
अजन्मे बच्चों का लिंग
और पूछते हैं
दूधमूँहे अबोध का धर्म,
जानना चाहते हैं
शवों की जात
और कहते हैं 
स्वयं को मनुष्य
क्यों ..?

अक्षिणी

दायरे..

हाँ मुझे भी मुझ सा ही रहने दो
न तुम बदलो न हम
अपने मन की करने दो
मगर अर्थ क्या जो
विलग किनारों  से बहते आएं
साथ हो कर भी सदा
अपने दायरों में जीते आएं
नेह का दरिया
हमें छू कर गुजर जाए
स्नेह का सोता कभी
समंदर न बनने पाए
पर हाँ
तुम तुम रहो मैं मैं
कभी हम न होने पाएं..

अक्षिणी