वही गिनते हैंं वही गुनते हैं..
मोतियों के ढेर से हर बार,
वही ईमान की दो कोड़ियाँ चुनते हैं..
अक्षिणी
किताब में लिखा दर्द
जब बहने लगे तेरी आँखों से
किताब के पन्नों पर बिखरे काँटे
जब चुभने लगे तेरे पैरों में
किताब की रवानी ज़िंदा हो
थिरकने लगे तेरे मन में
किताब के हर्फ़ जब
घाव बन रिसने लगे तेरे तन से
किताब की बगिया के फूल
जब महकने लगे तेरी साँसों में
अंगार से दहकने वाले अच्छर
मशाल से सुलगने लगे तेरे दिल में
तो समझना
कि तुमने पढ़ना सीख लिया है..
अक्षिणी
वो शादी की तस्वीरें ..
अब पहचानी नहीं लगती,
वो चोरों का राजा तो लगता है..
मैं रूप की रानी नहीं लगती..
कुपोषित सिमटी
कोमल सी जो बैठी है
ये खाती पीती मुटियायी सी
महारानी नहीं लगती..
अनुभव से जो हासिल है,
बालों में चांदी नहीं दिखती..
मेरे बच्चों के बापू की
ये तस्वीर सुहानी नहीं लगती..
देखी सी तो लगती है मगर
अपनी ये कहानी नहीं लगती..
भोली भाली अब भी है मगर
ये लड़की वो दीवानी नहीं लगती..
वो शादी की तसवीरें अब,
पहचानी नहीं लगती..
अक्षिणी..