प्रत्यंचाएँ तय करती है
संधानों की सीमाएं..
सात सुरों की तान छीनती,
अनघड़ वीणा की तन्याएँ....
अक्षिणी
प्रत्यंचाएँ तय करती है
संधानों की सीमाएं..
सात सुरों की तान छीनती,
अनघड़ वीणा की तन्याएँ....
अक्षिणी
वाह री दिल्ली
क्या दिन आए हैं ..
दिल्ली के मालिक
चौखट चौखट
नाक रगड़ रहे हैं..
-अक्षिणी
देह भी दें ,नेह भी दें
प्राण भी दें ,मान भी दें
माँ भारती को हम
समुचित सम्मान भी दें..
जी सकें निज देश हेतु,
आन पर हम जान भी दें..
अक्षिणी
धन्य हो संसार,
कितने दोहरे प्रतिमान
कहने को देवी का नाम,
न मान न सम्मान,
न मुझ पर अभिमान
पग-पग अपमान,
तिल-तिल तिरस्कार,
झूठा नारी पे अहसान
अक्षिणी
कथा है या कहानी है,
तेरी है या मेरी जुबानी है..
हँसते गाते पूरी हो बस
छोटी सी ये ज़िंदगानी है..
अक्षिणी
औरतें,
सुबह की धूप सी औरतें
हवाओं के साथ चलती हैं..
बदलाव की आहट सुनती हैं,
इंकलाब की आवाज़ बनती हैं..
औरतें,
बहते पानी सी औरतें,
किनारों का मन रखती हैं.
तसवीरों में चेहरे टांगती हैं,
और दीवारों को घर करती हैं..
औरतें,
गीली मिट्टी सी औरतें,
हर रूप-रंग में ढलती हैं.
खुशबू सी बिखरती हैं,
तपती हैं, निखरती हैं..
औरतें,
पारे की बूँदों सी औरतें,
टूटती हैं, दरकती हैं.
गिरती हैं, सँभलती हैं,
फिर जंग नई लड़ती हैं..
औरतें,
इंकलाब की आवाज़ बनती हैं..
अक्षिणी