शुक्रवार, 12 मई 2017

*आप के कीड़े..*


आप के कीड़े कुलबुलाने लगे हैं,
भीतर बाहर बिलबिलाने लगे हैं.
सत्ता की गोंद से चिपके थे सारे,
छत्ते से दूर छिटियाने लगें है..

कुर्सी के पठ्ठे थे सारे के सारे,
सड़कों पे अब गरियाने लगे हैं.
झाडू की सींकों से बँधे ये
इक दूजे को लतियाने लगे हैं..

मलाई के चाटनहारे सब
नया दही जमाने लगे हैं..
भेदी ये सारे के सारे
केजू की लंका ढहाने लगे हैं..

कलई जो उतरी तो
बस छटपटाने लगे हैं..
गिरगिट के ताऊ सब
असली रंग दिखाने लगे हैं

माल पे फेर के झाड़ू ये सारे
जनता से आँखें चुराने लगे हैं..
जिस हाँडी में खाते थे सारे,
चौराहे पे ठिकाने लगाने लगे हैं..

धरने तमाशे इनके सारे
हमें अब गुदगुदाने लगे हैं..
दिल्ली के दिलवालें अब
ठेंगा दिखाने लगे है..

अक्षिणी भटनागर

उल्काएं..

इंतिहा जवाब तो आए थे,सवालों को भाए नहीं.
इंकलाब भी लाए थे, तुम हम समझ पाए नहीं..

है यकीं अगर तो उसे रिहा कर दो,
वो न सही तुम ये वादा वफा कर दो..

यादों वादों का इतना ही फसाना है,
ये जो आएं तो सुकूं छिन जाना है.
इंतिहां मुसीबत का सामां है ये
हमने इन्हें गले ना लगाना है..

छोड़ो भी अब,काहे बैठे हो जमाने को भुलाए..
जाने न मुहब्बत वो,माने ना जो तुम्हारे मनाए..

अक्षिणी भटनागर

गुरुवार, 11 मई 2017

शर्मिंदा..

धन्यवाद महोदया,
आपने ये माना कि आप शर्मिंदा हैं,
होना भी चाहिए..

बात शर्मिंदगी की है,
दूर तलक तो जानी है.
आप जन्म ले कर शर्मिंदा हैं और
ये धरती आप को जन्म देकर शर्मिंदा है..

मौलवियों के मशवरों पर चलें आप,
और वतन ढोए आप के पाप..
फिर शर्मिंदा भी हों आप..
ये कहाँ का इंसाफ?

सच तो ये है कि हम शर्मिंदा हैं,
कि आप से रीढ़विहीन हमारे नेता हैं,
सुभाष का बंगाल शर्मिंदा हैं..
क्रांति के आह्वान शर्मिंदा हैं,
भूत, भविष्य, वर्तमान शर्मिंदा है..

आप की ज्यादतियों पर
बंगाल का हर जवान शर्मिंदा हैं..
आप के आचार विचार पर
देश का संविधान शर्मिंदा है..

आप क्यों हैं शर्मिंदा ?
आपको भारतीय कहने वाला
विधान शर्मिंदा है,
आपको चुना,
पूरा पश्चिम बंगाल शर्मिंदा है..

अक्षिणी भटनागर

बुधवार, 10 मई 2017

अंदाज़

तदबीरों से अरमान सँवरते देखे हैं,
तकरीरों से अल्फाज़ सुलगते देखे हैं,
तकदीरें बदले जो पहलू तो
तस्वीरों के अंदाज़ बदलते देखे  हैं.

अक्षिणी भटनागर

मंगलवार, 9 मई 2017

महाराणा..

काँटों और उजाड़ों में
बीहड़ों और पहाड़ों में
वो मान धरा का रखने वाला
था मेवाड़ धरा का रखवाला

तपती गर्मी के अंगारों में
आँधी में और बरसातों में
रजपूती आन पे मरने वाला
हिन्द की शान पे मिटने वाला

तीरों और तलवारों से
भालों और कटारों से
खूब लड़ा वो ऊँचे सर वाला
महलों का राणा वो मतवाला

घोर अंधेरों में भटका जो
सिसोदिया सूरज था वो
वो घास की रोटी खाने वाला
एकलिंग को शीश नवाने वाला

आन की खातिर प्राण प्रतापी
शीश दिए शोणित अभिमानी
मुगलों की ताकत तोलने वाला
मेवाड़ का राणा वो महाराणा..

अक्षिणी

शुक्रवार, 5 मई 2017

सुबहों को..

सुबहों को उजाले खिल जाएं तो
शामों को निवाले मिल जाएं..

चेहरों की नकाबें हट जाएं तो,
शिकवों के खजाने खुल जाएं..

जख़्मों के बहाने मिल जाएं तो,
मरहम की दुकानें खुल जाएं..

आहों के समंदर धुल जाएं तो,
खुशियों के तराने बन जाएं..

शब्दों की कटारें तन जाएं तो,
बातों के फसाने बन जाए..

अक्षिणी भटनागर

मंगलवार, 2 मई 2017

मगर..

ज़िंदा तो है मेरा आप मगर जीता नहीं है,
होता तो है सरेअक्स मगर मिलता नहीं है..

बुनता तो है कुछ ख़्वाब,मगर चुनता नहीं है,
सहता तो है हर बात मगर कहता नहीं है..

उलझा तो है ये वक्त मगर ठहरा नहीं है,
महका तो है कुछ देर मगर बहका नहीं है..

चलता तो है मेरे साथ मगर दिखता नहीं है,
सुलगा तो है हर बार मगर जलता नहीं है..

सहमा सा है एतबार मगर बिखरा नहीं है,
करता तो है इकरार मगर रुकता नहीं है..

अक्षिणी भटनागर