फिर यूपी का चुनाव,फिर से रागा पै दाँव
फिर वही भटकाव, फिर वही ठहराव.
पैंतालिस के पार युवा कहलाने का चाव,
फिर बच्चों सा बर्ताव,हवा में चलाए नाव.
और सोच का अभाव, बस डोप का प्रभाव,
देश,लाज और नाम, बेच खाए बट्टे के भाव..
अक्षिणी भटनागर
शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017
पैंतालिस पार..
बुधवार, 8 फ़रवरी 2017
मुस्करा के मिल
कहीं किसी रोज इठला के मिल,
लहरा के मिल, बल खा के मिल,
शरमा न यूं, 'इंतिहा' ज़िंदगी,
कहीं किसी रोज मुस्करा के मिल.
कहीं किसी रोज इतरा के मिल,
चाह के पन्नों पे बिखरा के मिल,
झुका न यूं नजर 'इंतिहा' ज़िंदगी,
कहीं किसी रोज मुस्कुरा के मिल.
ठहर किसी ठोर ,अलसा के मिल,
बहक जरा देर, बहला के मिल.
जरा देखें तेरे तौर 'इंतिहा' ज़िंदगी,
कहीं किसी रोज मुस्करा के मिल.
कहीं किसी रोज लहरा के मिल,
महक जरा देर महका के मिल,
छू कर देखें तुझे 'इंतिहा' ज़िंदगी,
कहीं किसी रोज पास आ के मिल.
-अक्षिणी भटनागर-
मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017
खुदा होगा..
हो तेरी जो राह सही,
और खुद पै हो यकीं,
जमाने से जो 'इंतिहा' जुदा होगा,
बंदा वही तेरा खुदा होगा..
With special reference to SLB.
यूं बांटने चला तु नफरत,
थी कुफ्र तेरी फितरत,
तुझको नहीं पता होगा,
शैतां तेरा खुदा होगा..
-अक्षिणी भटनागर-
तम्मा-तम्मा
हाथी और झाड़ू संवारते रहे अपने अरमां,
पप्पु और टीपू जलाते रहे अपनी शम्मा,
उधर नाची ऐसी वो छम्मा-छम्मा
और चिनम्मा बन गई नयी अम्मा
पनीर सेल्वम् निकले उसके भी अब्बा,
लो अब कर लो तुम तम्मा-तम्मा..
-अक्षिणी भटनागर-
रविवार, 5 फ़रवरी 2017
आभार..
सब स्वरों में ओम तुम हो, नश्वरों में प्राण तुम.
ज्योति का आह्वान तुमसे, हो सकल संसार तुम.
अग्नि का संधान तुमसे, वायु का संचार तुम.
सब ज्ञान-विज्ञान तुम से, सत्य का संज्ञान तुम.
स्वस्ति का समभाव तुमसे, सृष्टि का आधार तुम.
सब स्वप्न हैं साकार तुमसे, हो धरा आकाश तुम.
हैं सभी संस्कार तुमसे, हो सोलहों श्रृंगार तुम.
है ऋणी संसार सारा, श्री शक्ति का सत्कार तुम.
हे ईश्वर जो तुमने दिया है, उसके लिए आभार..
और जो नहीं मिला, वह भी तुम्हें समर्पित..
- अक्षिणी
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
मदमस्त सिद्धहस्त..
अक्षरकृमियों के इस वन में
सब कोई मंचस्थ हैं..
जो व्यस्त हैं वे तृप्त हैं,
जो अस्त हैं वे त्रस्त हैं
और जो न व्यस्त हैं न अस्त हैं
वो सब के सब बड़े पस्त हैं.
कुछ स्वस्थ हैं तो सब उदरस्थ है.
(हाजमा अच्छा है भाई !)
फिर कुछ संत हैं कुछ भक्त हैं,
कुछ त्यक्त हैं कुछ आसक्त है.
सत्य सबके अंतस है
ये अलग बात है,अव्यक्त है.
जो धर लेते हैं वो सख्त हैं
जो कह देते हैं वो मस्त हैं
जो भी हो सब के सब मदमस्त हैं,
कमबख्त सारे सिध्दहस्त हैं..
-अक्षिणी भटनागर
(सारे छपास के रोगियों को सादर समर्पित)
बुधवार, 1 फ़रवरी 2017
मजा नहीं आया..
कुछ भी कहिए वित्तमंत्री जी मजा नहीं आया
राॅकेट की उम्मीद थी अनार भी नहीं चलाया.
इस बार का बजट मन को नहीं भाया
यकीन मानिए जरा भी समझ नहीं आया.
न बुलेट ट्रेन चलाई न भाड़ा बढ़ाया
फालतू में रेल बजट को साथ मिलाया
खोई बाजी खाली अपना दाँव लगाया
खूब था मौका तुमने यूं ही क्यों गंवाया?
कठिन घड़ी है चुनावों ने द्वार बजाया
फिर भी ना कोई तुमने तीर चलाया
चुनाव आयोग का तुम पै था साया
क्या था डर ,क्यों तुम्हारा जी घबराया?
ढूँढने वाले ढूँढ ही लेंगे बारीकियाँ इसकी,
उजालों में बदल ही देंगे तारीकियाँ इसकी,
लेकिन बँधु मेरा नन्हा दिल घबराया
यकीन मानिए बिल्कुल मजा नहीं आया
कच्चा पक्का अटका भटकाशेर सुनाया
खूब समय था रट्टा काहे नहीं लगाया?
फिर पुराना भूरा बक्सा साथ में आया
नये रंग में इसको क्यूं नहीं रंगाया?
पार्टी घिरी खड़ी है,दुश्मनों ने हाथ मिलाया
ताक देखते पप्पुकेजरी और ममता माया
इनको हँसने का क्यूं तुमने बहाना दिलाया?
मेरी समझ में जरा न आया, जरा न भाया..
अक्षिणी भटनागर