शनिवार, 14 जनवरी 2017

हाथ, कमल और...

आज महावीर,शिव,नानक
इस्लाम के हाथ आये हैं चुनावी जंग में,
कल इंद्र और गणपति के
हाथी आएंगे मैदानेजंग में.
फिर ब्रह्मा विष्णु लक्ष्मी और
सरस्वती के कमल खिलेंगे पंक में,
सवाल ये है कि सायकिल
कौनसे धर्म के देवता चलाएंगे?

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

शाश्वत

ना सुख ना दुख,
बस एक यही शाश्वत है.
कभी दौलत की, 

कभी शोहरत की,

इंसानियत से नफरत की,
रोटी के चंद टुकड़ों की,
शर्म से तार-तार चीथड़ों की 
रिश्तों के सौदागरों की ,
नफरत के खूनी दरिन्दों की ,
नुक्कड़ों और चौराहों पे
गिद्धों से मंडराते भेड़ियों की,

बस भूख शाश्वत है,
बस भूख शाश्वत है....

बुधवार, 11 जनवरी 2017

समानता का अधिकार..

Rसुबह-सुबह गरमागरम खबरों के साथ चाय सुड़कते हुए ठंड से हमारी जंग बदस्तूर जारी थी.अचानक पड़ोस का दरवाजा खुला और शाॅल स्वेटर में लिपटी काम वाली बाहर निकली. दायें-बायें देखा और पिच्च्....सड़क पर रंगोली बना द्रुत गति से अगले घर में घुस गई..
हमने भी भीतर का रुख किया ही था कि सब्जी  वाले की पुकार सुनाई दी.हमें बढ़ती महँगाई का अहसास करा वो चलने लगा और पिच्च्....
सड़क पर एक नयी रंगोली बना ये भी चल दिया..
नौ बजे का समय, दफ्तर की तरफ हमारी नियमित फार्मूला वन जारी थी और मन ही मन आगे चल रही लक्ज़री सेडान की मंथर गति को को कोसा जा रहा था कि चमकदार गाड़ी का शानदार दरवाजा खुला, सूट-बूट धारी एक ऐंठी हुई गर्दन आधी बाहर लटकी और पिच्च्....
इस बार की रंगोली के कुछ छींटे आस पास की गाड़ियों तक भी पहुंचे और ठक से कार के दरवाजा बंद हो गया.
गाड़ी अपनी गति से चलती रही और समानता का अधिकार हमारा मुंह चिढ़ा गया. कोने में लगा स्वच्छ भारत का पोस्टर ठहाका मार के हँस पड़ा..

स्वयंप्रज्ञा :

कुछ ना कहो...
बस चुप रहो...
वक्त बोलेगा..

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

बस साँस भर ..

तितलियाँ हैं ये, इन्हैं छू लेने दो सुमन हर,
रश्मियाँ हैं ये, निखर जाने दो क्षितिज पर,
रेशमी उंगलियों से उकेरती हैं आकाश नये,
लड़कियां हैं ये, जी लेने दो इन्हैं बस साँस भर.

बचपन

जाने कैसे बीता करते थे  दिन,
टीवी और मोबाइल के बिन?
किस तरह गुजरती थी वो दोपहर,
कंचों के सहारे व्हाट्सएप के बिन?
बर्फ के गोलों की चुस्कियां और
खट्टी नारंगी की गोलियां,
सतोलियों के सहारे गुल्लियों के संग
वो डोर से उड़ी पतंग
जाने कैसे बीता करते थे वो दिन .
होली की ठिठोलियां और
दीवाली की रंगोलियां,
छत के तारे गिनती रात और
सहेलियों के साथ..कैसे बीता करते थे वो दिन ?

स्वयंप्रज्ञा: वक्त

मंजिले मिलती हैं उन्हैं जो चलें वक्त के साथ
ना वक्त से पहले ना वक्त के बाद...