सोमवार, 7 दिसंबर 2020

बेइंतिहा..

वो मिलते हैं इक रोज कुछ इस तरह,
टूट के ज़मीं से जैसे मिलता है आसमां..
आदमी सोच पाए नहीं ऐसी ज़ुम्बिश ये
ज़िंदा रहता है जज़्बा बेहिस बेइंतिहा..

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