गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

नव वर्ष..

              अभिनंदन नववर्ष का..
              नव वर्ष है, नव हर्ष हो..

                   प्रतिध्वनियाँ भय की हों विगत,
                   विस्मृत हों विपदाएं विकट
                   आशंकाएँ निर्मूल हों  समस्त,
                   जागृत हों अभिलाषाएँ नूतन..
              
                           हो आगत का स्वागत..
                           नव वर्ष है, नव हर्ष हो..
                     

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

ये कशमकश क्यूँ..

तू ही बता ए ज़िंदगी,बेइंतिहा तू बेरहम
ये कशमकश क्यूँ 
चैन-ओ-सुकूं, ओ मुस्कुराहटों से बेसबब
ये रंजिश क्यूँ 
तू ज़िंदगी ना मेहरबां, ना खुशनुमा,
ना ख़्वाब सी तू
तुझे जीने की मुसलसल ये जद्दोजहद 
हरगिज़ क्यूँ..

~अक्षिणी 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

कविता क्यों ..

           जो स्पर्श ना करे
           जो प्रश्न ना करे
           तो कविता क्या

                                     
                                        जो द्वंद्व ना कहे
                                        जो स्वछन्द ना बहे
                                        तो कविता कैसी

          
           जो उद्विग्न ना करे
           जो उल्लास ना भरे
           तो कविता क्यों 

                                       
                                       जो आस ना भरे
                                        जो त्रास ना हरे
                                        तो कविता कहाँ

          
          जो श्वास ना ले
          जो विश्वास ना दे
          तो कविता कौन..

                                       
                                        जो दृश्य ना रचे
                                        अदृश्य ना सृजे
                                        तो कविता कैसे..

           
           जो सत्य ना कहे
           जो स्वप्न ना गहे
           तो कविता क्यों

                                      
                                       जो प्रसंग ना गुने
                                       जो निसर्ग ना बुने
                                       तो कविता क्यूँकर

              ~अक्षिणी

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

अक्सर ख़ुद को ..

दुनिया के रंग में रंग नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
अपनी किसी तरंग में जिए जाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
शहद झूठ का लपेट नहीं पाते है,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
भीतर-बाहर जुदा हो नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..
दोहरा चरित्र कभी जी नहीं पाते हैं,
अक्सर ख़ुद को अकेला ही पाते हैं..

~अक्षिणी 

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

गधे और लिफ्ट

कमाल की कहानी है..
एक दस मंजिला भवन में लिफ्ट नहीं होने से लोगों को चढ़ने-उतरने में बड़ी दिक्कत होती थी,खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों को,तो लोगों ने एक युक्ति निकाली और कुछ गधे ले आए जो लोगों को ऊपर ले जाने और नीचे लाने का काम करने लगे।
गधों के मालिकों को मासिक किराया मिलने लगा।
किराए का 10% हिस्सा वे सोसायटी को देने लगे। सोसायटी के पदाधिकारी भी खुश।
ऐसा कई सालों चलता रहा..
मगर फिर चुनाव हुए और सब गड़बड़ा
गया। नये प्रबंधन ने सोचा कि क्यूँ ना लिफ्ट लगा दी जाए।
बस..विवाद शुरू हो गया।
सोसायटी के लोग धरने पर बैठ गए..
"ये तो गलत है.."
"सोसायटी का राजस्व चला जाएगा.."
"गधों के मालिकों का रोजगार चला जाएगा.."
"बेचारे भूखे मर जायेंगे.."
"गधों का क्या होगा.."
(मानवाधिकारों और पशुअधिकारों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन..)
सब के सब लड़ने को तैयार ..
प्रबंधन ने समझाया कि ऐसा नहीं होगा।
लिफ्ट सबके लिए है पर जो गधे पर जाना चाहे, वो गधे पर जाते रहे।
लेकिन लोग तो जिद पर अड़ गए..
आखिर प्रबंधन को झुकना पड़ा।
तो समझौता हुआ कि लिफ्ट में जाने वालों को गधों की सेवाएं लेनी अनिवार्य होंगी।
तो अब गधे लोगों को लिफ्ट तक ले जाएंगे..!!!

पूर्वसूचना: यह कहानी विशुद्ध एवं निर्मल हास्य हेतु लिखी गई है, इस का किसी वास्तविक घटना-दुर्घटना से कोई लेना-देना नहीं है।

🙏

~अक्षिणी 



मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

सोच को लगा के पंख तू..

                   

                   सोच को लगा के पंख तू,
                   देख खूब आसमां के रंग तू..
                   बादल-बादल उड़ते-चलते,
                   रख अपनी माटी को संग तू..
                   

                   सोच को लगा के पंख तू,
                   थाप जीविका की चंग तू..
                   सत्कर्म-धर्म हैं हाथ अपने,
                   फूँक ज़िन्दगी का शंख तू..
                   

                   सोच को लगा के पंख तू
                   देख इस दुनिया के रंग तू..
                   वक्त को ले चल साथ अपने,
                   जीत इस जमाने से जंग तू..

                  ~ अक्षिणी..







                   

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

बेइंतिहा..

वो मिलते हैं इक रोज कुछ इस तरह,
टूट के ज़मीं से जैसे मिलता है आसमां..
आदमी सोच पाए नहीं ऐसी ज़ुम्बिश ये
ज़िंदा रहता है जज़्बा बेहिस बेइंतिहा..

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

अँधेरे में..

राम सवालों के घेरे में, कृष्ण ग्वालों के फेरे में..
बुद्ध लगा रहे हैं पोंछा इन दिनों अपने डेरे में..
भगवान माटी का माधो और पूजा ढकोसला,
विज्ञान को कर आगे मनुज भटक रहा अँधेरे में..

~शिकंजी

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

ज़िद..

है ज़िद अगर ये तो ज़िद ही सही,
ज़िंदगी तुझे छोड़ कोई ज़िद ही नहीं ..

~अक्षिणी 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

कैसे..

जीतों के संग तो जी लें हम, मरतों के साथ मरें हम कैसे..
मीतों के नाम का खालीपन, कह दो के राम भरें हम कैसे..

गीतों में जिनको जीते आए, उन बोलों की राग सुनें हम कैसे..
रीतों के दीप ना जलने पाए, अब राखों की आग चुनें हम कैसे..

जिनको देख के जीते आए, उन आँखों पे द्वार जड़ें हम कैसे..
इसको उसको खो कर अब, जीवन का संग्राम लड़ें हम कैसे..

पक्के पत्तों का गिरना समझें, नन्हें पौधों का ताप हरें हम कैसे..
सबके आँगन क्यों बिजली गाजे, हर घर जा घाव भरें हम कैसे..


~अक्षिणी

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

ख़ुदा..

सुनते नहीं किसी दुआ की ज़ुबाँ 
कितने ख़ुदा है यहाँ ख़ुदा के सिवा..
~शिकंजी..

सुजान..

जननी जणे तो जण जे जैसो वीर सुजान,
नीतर निपूती जीवजे जनम अकारथ जाण..

ख़ुदा..

सुनते नहीं किसी दुआ की ज़ुबाँ 
कितने ख़ुदा है यहाँ ख़ुदा के सिवा..
~शिकंजी..

बाज़ार..

बदल रही हैं ख्वाहिशें , उतर रहा खुमार !
हर साल का बाज़़ार ये , सजा-धजा बुखार !! 

#धनतेरस_की_हार्दिक_शुभकामनाएं

बुधवार, 11 नवंबर 2020

कमी..

कमी..
जो कसक बन चले..
एक धड़क बन चले..
कमी..
लाजिम ये सफ़र कर दे..
मंजिल-ए-नज़र कर दे..
कमी..
हासिल-ए-उमर बन चले..
ज़िंदगी मुख़्तसर कर चले..


~अक्षिणी 

सोमवार, 9 नवंबर 2020

छीन लेंगे..

सँभल के रहना तुम, 
वो झुंड में आएंगे
राहतों के झुनझुनों से चाहतों की हँसी छीन लेंगे..

सँभल के रहना तुम, 
वो लौट कर आएंगे,
आसमां के सितारे दिखा कर वो ज़मीं छीन लेंगे..

आहिस्ता से हँसना तुम,
वो हर बार आएंगे,
जन्नतों के ख़्वाब दिखा के हर खुशी छीन लेंगे..

चाल उन की समझना तुम,
वो बदकार फिर आएंगे..
ख़्वाहिशों की लौ जगा कर रोशनी छीन लेंगे..

बातों में ना फँसना तुम,
वो बाज नहीं आएंगे..
उम्मीदों के पंख लगा कर ज़िंदगी छीन लेंगे..

~अक्षिणी 

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

जय जय हो..

तेरी जय हो, मेरी जय हो,
सबकी जय और विजय हो..
केवल जय ही लक्ष्य हो अंतिम,
फिर मूल्यों का चाहे क्षय हो..

तेरी जय हो, मेरी जय हो,
सबकी जय और विजय हो..
जय ही जब हो श्रेयस्कर तो,
पुण्य-पाप का क्योंकर भय हो..

तेरी जय हो, मेरी जय हो,
सबकी जय और विजय हो..
जय ही जय हो वांछित स्वर तो,
सत्य-असत्य की साझी लय हो..

तेरी जय हो, मेरी जय हो,
सबकी जय और विजय हो..
पद ही जय हो,धन की जय तो,
अभिलाषा केवल धनसंचय हो..

~अक्षिणी 

रविवार, 1 नवंबर 2020

What happen in India tonight..

Pray tell me who am i,
where's my right?
Why curse what happen
in India tonight?

A million wrongs that
killed my might
Why curse what happen 
in India tonight?

Pray tell me then,why
shouldn't i fight?
Why curse what happen
in India tonight?

Remember the rough hand,
the betrayal, the slight
Why curse what happen
in India tonight?

The twisted tales of yore
the history, the plight
Why curse what happen
in India tonight?

All that i ask for today
just and equal right
Why curse what happen
in India tonight?

~Akshini

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

हद-ए-मामूल..

यूँ हमसे न पूछ ज़िंदगी का तफसरा,
हद-ए-मामूल थी,जाने कब गुज़र गई..


~अक्षिणी 

मुल्ज़िम..

मैं अपने नाम का मुल्ज़िम हूँ जमाने के लिए,
यूँ तेरे नाम से मशहूर हूँ आजमाने के लिए..

~अक्षिणी

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

नारी तुम बैठो पाट..

नारी तुम केवल श्रद्धा हो
बन जाओ देवी,बैठो पाट
कुंकुम भाल चढ़ें,लक्ष्मी बन करो राज
अगर चंदन से महको केवल आज
कल फिर वही ठोकरों के काज
हाँ,धीमी रखना ज़रा अपनी आवाज़
देवी हो,नाज़ुक रखो अंदाज़
उठाओ नहीं अधिकार की बात
पूजित हो,प्रतिष्ठित रहो
सम्मान से वंचित रहो
श्रद्धा हो,शक्ति न बनो..

~अक्षिणी 

सप्तपदी..

बिंदु पथ हैं अपने वर्तुल सारे,
चलते निस दिन बिना किनारे..
आदि से अंत हो अंत से आदि,
फेरे सप्तपदी के सभी कुँवारे..

~अक्षिणी 

सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

क्या कहिए..

रुपहली सी चमक
चाँदी से तारों की क्या कहिए..
चिंगारी सी थिरक
ठहरे अंगारों की क्या कहिए..
माथे की सलवटों में
उम्रों का तक़ाज़ा क्या कहिए..
संजीदा उन चश्मों से
नज़रों का नज़ारा क्या कहिए..

#यूँ_ही
~ अक्षिणी..😂

यादें..

यादें.. 
जो साँस लिया करती हैं..
जो साथ जिया करती हैं..

यादें..
जो साथ दिया करती हैं..
जो थाम लिया करती हैं..

यादें..
जो याद दिया करती हैं..
जो याद किया करती हैं..

यादें..
तो कर्ज़ हुआ करती हैं..
इक फ़र्ज़ हुआ करती हैं..

यादें..
कुछ सर्द हुआ करती हैं..
बस दर्द दिया करती हैं..

~अक्षिणी 

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

तितली सा मन..

खिला हुआ जो
मिला नहीं कोई.
बाँट आया
मुस्कु


○°
राहटें,
मेरा तितली सा मन..
 
~अक्षिणी ..

तुम जो हो..

संकट नहीं बनाता तुम को,
तुम जो हो..
संकट सच दिखलाता जग को,
तुम जो हो..

~अक्षिणी 

आकाश नया..

अँधियारों को चीर के आए हैं,
पाए हैं आकाश नया,आकाश नया..
भारत की मिट्टी को छू पाए हैं,
पाए हैं आकाश नया,आकाश नया..

दुखड़ों का विस्तार बहुत था,
संकट की चीत्कार बहुत..
विधर्मियों का ताप बहुत था
पापी का अत्याचार बहुत..

मुश्किलों को जीत के आए हैं,
पाए हैं आकाश नया,आकाश नया..

भारत के अब वासी हम हैं
अब अपनी है पहचान नई..
कहलाते हिंदुस्तानी हम हैं,
अब अपनी है ये शान नई..

जंजीरों को कील के आए हैं,
पाए हैं अधिकार नया,आकाश नया...

~अक्षिणी 

पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के लिए जिन्होंने अभी अभी भारत की नागरिकता प्राप्त की है..

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

बड़े दिल वाली..

फिर सूना होगा कोई कोना,
फिर होगा मुझको कुछ खोना..
कह रहे हैं लोग फिर मुझसे
तुम तो बड़े दिल वाली हो ना..


~अक्षिणी ..

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2020

राम जी के नाम से..

हवाएं नाराज़ है इन दिनों निजाम से,
हालात-ए-मुल्क ओ माहौल-ए-आम से..

कुछ रूठे से हैं अपने ही अपनी सरकार से,
कब तक चलेगा काम राम जी के नाम से...

सरकार को न रहा सरोकार अब अवाम से,
रह गई है जनता की सरकार बस नाम से..

चुभोते जा रहे हैं नश्तर फिज़ा-ए-तमाम से,
कि बिक रहा है बस ज़हर मरहम के नाम से..

नहीं चाहिए कोई मुकाम मुझे इस दाम से,
ये राम नहीं मिलता मेरे राम जी के नाम से..

~ अक्षिणी 

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

खुली किताब..

खुली किताब हुआ चाहते थे जनाब,
कुछ पढ़ गए कुछ लिख गए अज़ाब..

खुली किताब हुआ चाहते थे हुजूर,
कुछ पढ़ गए कुछ लिख गए फ़ितूर ..

नग़मानिगार हुआ चाहते थे पुरसुरूर,
कुछ कह गए कुछ सुन गए जीहुजूर..

यूँ लाजवाब हुआ चाहते थे बेहिसाब,
कुछ भर गए कुछ कर गए यूँ हिसाब..

यूँ आसमान हुआ चाहते थे पुरशबाब, 
कुछ डर गए, कुछ घर गए आली जनाब..



~अक्षिणी 

बुधवार, 16 सितंबर 2020

इरादा तो कर..

सुन किसी शाम मुलाकात का वादा तो कर,
वक्त मिल जाएगा तू मिलने का इरादा तो कर..

सुन किसी चाह की मंजिल का तकाज़ा तो कर,
राह खुल जाएगी तू चलने का इरादा तो कर..

सुन किसी रात की गर्दिश का हवाला तो कर
शम्म्अ खुद आएगी, जलने का इरादा तो कर..

यूँ किसी ख़वाब की ज़ुम्बिश का चराग़ा तो कर,
बात रह जाएगी, तू कहने का इरादा तो कर..

सुन मेरी याद की रंजिश का नज़ारा तो कर..
ख़ाक रह जाएगी,तू भुलाने का इरादा तो कर..

अक्षिणी 


रविवार, 13 सितंबर 2020

Read my Dear..

Read my friend..
Read my dear

Read what you want
Read what you like
Read what you chant
Read what you can't

For Reading is a pleasure
Cherish Reading treasure..

Read my friend
Read my dear

Read something nice
Read something right
Read something light
Read someone bright

For Reading shows the way
Reaching deep and far way

Read just to know
Read just to grow
Read if you can
Not just to show

For Reading is a great fun
It's nectar dipped a  bun

Read my friend..

Akshini





शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

सुब्रह्मण्यम भारती..


अक्षिणी.. 🇮🇳


 
आज ग्यारह सितम्बर है..
भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा दिन..
आज ही के दिन स्वामी विवेकानंद ने
शिकागो में विश्व हिंदू सम्मेलन में वह ऐतिहासिक भाषण दिया था जिसके बारे में सोच कर आज भी हमारा ह्रदय अपने धार्मिक वैभव और थाती पर गर्व से आल्हादित हो उठता है..
आज का दिन हमारी गौरवशाली परंपरा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ये दिन देश की एक और महान विभूति से जुड़ा है।
आइए आज बात करते हैं कविवर सुब्रह्मण्यम भारती की जिनके गीत हम गाते हैं, जिनका देवलोक गमन आज ही के दिन हुआ..
और जिनके अंतिम संस्कार में केवल चौदह व्यक्ति सम्मिलित हुए थे..
है ना आश्चर्य की बात..?
कहते हैं कि ऐसा तो किसी शत्रु के साथ भी न हो..किंतु बिल्कुल ऐसा ही हुआ तमिलनाडु के सबसे लोकप्रिय स्वातंत्र्यवीर 'भारतीयार' के साथ..
महाकवि भारतीयार आधुनिक युग के महानतम
तमिल कवि कहे जाते हैं।
उनका कहना था कि "अलग होते हुए भी सभी भारतीय एक ही माँ की संतान हैं तो बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की क्या आवश्यकता है?"
आपकी अधिकांश रचनाएं धार्मिक,राजनैतिक और सामाजिक विषयों पर लिखी गई हैं।
आपके लिखे गीत तमिल चलचित्रों और कर्नाटक संगीत समारोहों में अत्यधिक लोकप्रिय हैं।
वे एक शाक्तिक अद्वैती थे जिन्हें समूची सृष्टि और उसका अस्तित्व माँ काली के नृत्य का विस्तार दिखाई देता था।
जीवन के पाँचवें वर्ष में ही मातृशोक के कारण 11/12/1882 को जन्मे चिन्नास्वामी सुब्रह्मण्य अय्यर और इलाकुमी अम्माल की संतान सुबय्या का बचपन बहुत दुख में बीता.
कविताओं और तमिल साहित्य में उनकी रुचि पिता को पसंद नहीं थी,वे उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे किंतु धीरे-धीरे वे समझ गए..
और उन्हें तिरूनेलवेली के राजा की सेवा में भेज दिया।
एक बार राजा के दरबार में सुबय्या का एक पंडित जी से वादविवाद हुआ जिससे प्रभावित हो कर राज दरबार ने उन्हें "भारती" की उपाधि से सम्मानित करने का निर्णय किया।
Image
1898 में पिता की मृत्यु के बाद वे अपनी जीवनी संगिनी चेल्लम्मा के साथ बनारस आ गए जहाँ उनके चाचा-चाची एक मठ का प्रबंधन सँभाल रहे थे।
वहाँ उन्होंने सेंट्रल हिंदू कालेज में प्रवेश लिया,हिंदी और संस्कृत सीखी और अपनी अंग्रेजी को और निखारा।


इन्हीं दिनों उन्होंने अपनी चिरपरिचित वेशभूषा अपनाई। बाल छोटे करवाए,मूँछें बढ़ाई और उत्तर भारतीय रंग ढंग के अनुसार अपना विशेष साफा बाँधने लगे..
इट्टेयापुरम के राजा ने उन्हें लौटने को कहा तो वे 1904 में वापस लौटे किंतु राजसी वैभव उनके मन नहीं भाया.
और वे मदुरै चले गए जहाँ भाग्य ने पलटी खाई और उनकी भेंट स्वदेशी मित्रण के संपादक जी. सुब्रह्मण्य अय्यर से हुई और वे स्वदेशी मित्रण के उप संपादक बन गए।
उनका मुख्य काम था अंग्रेजी समाचारों का तमिल में अनुवाद करना।
और उन्हें अवसर मिला स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर आदि राष्ट्रवादियों के ओजस्वी भाषण पढ़ने का..और सहानुभूति जागृत हुई राष्ट्रवादियों के साथ..
इस से उन्हें लिखने की प्रेरणा भी मिली और प्रशिक्षण भी..
स्वदेश मित्रण के उप संपादक के रूप में भारती 21वें अखिल भारतीय काँग्रेस अधिवेशन में भाग लेने काशी गए जहाँ वे सिस्टर निवेदिता से मिले। उनके कविता संग्रह के दो अंक स्वदेश गीतांजलि और जन्मभूमि सिस्टर निवेदिता को समर्पित हैं।
देशभक्त मंडयम बंधुओं ने जब "India" साप्ताहिक निकाला तो भारती उसके संपादक बने।इसके साथ ही वे अंग्रेजी पत्रिका बाल भारती, तमिल पत्रिका चक्रवर्तिनी और तमिल दैनिक विजया के संपादक रहे।
"India" में भारती ने अपनी कविताओं से जान डाल दी जिनमें उदारवादियों का उपहास था और स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने वालों की भर्त्सना।एक कार्टून प्रकाशित हुआ जिसमें नरमपंथियो को लार्ड मोर्ले द्वारा डाली हुई हड्डी के लालची कुत्ते जैसा दिखाया गया।
वे अरबिंदो घोष से बहुत प्रभावित थे। उनसे मिले भी..
देशभक्ति का संघर्ष में जेल जाने और अंग्रेजों की ज्यादतियों के चलते वे आर्थिक रूप से विपन्न हो गए और जब बाहर आए तो एक हाथी की टक्कर से घायल हुए और कुछ दिनों बाद 11/09/1921 को उनका निधन हुआ।
वे कार्ल मार्क्स से अधिक वामपंथी थे किंतु वामपंथियों ने कभी उन्हें याद नहीं किया क्योंकि वे सनातन धर्म में विश्वास रखते थे। ह्रदय से उसी का गुणगान करते थे।

महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती के जीवन को एक छोटी सी रचना में समेटना असंभव है..

आज बस इतना ही..शेष फिर कभी..
🙏
 

 

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

सुनो बात ज़रा मेरी माते..

सुनो बात ज़रा मेरी माते,
कुछ बाँट भी दो सौगातें..
कर जोड़ खड़े तेरे आगे,
सारे देश के सगे-सगाते..

काश लालू जी होते,
चारे की रेल चलाते..
मार के डंडे दसियों, 
इको की भैंस भगाते..

काश चिदु जी होते,
गमलों में गोभी उगाते..
करोड़ों देश का खाते,
चाऊमीन का चूना लगाते..

काश राहुल जी होते,
आलू से सोना बनाते..
बुलियन को जेब में ले के,
सौ टंच वो माल बनाते..

मनमोहन प्यारे होते,
चुपचाप खड़े वो रहते..
माई के चरणों फिर वो,
इको की तोप चलाते..

ऐसी बला लगी ये कोरोना,
सारी दुनिया बगलें झांके.. 
GDP डुबकी ऐसी मारे,
सब भूल गए हैं छलांगे..

सुनो बात ज़रा मेरी माते..
कुछ बाँट भी दो सौगातें..
कर जोड़ खड़े तेरे आगे, 
सारे देश के सगे-सगाते..

अक्षिणी 

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

नहीं अच्छा..

धार के बहाव में पतवार का खोना नहीं अच्छा
दिलदार की तलाश में प्यार का खोना नहीं अच्छा
ज़िंदगी सफर हुआ करती है कोई रहगुज़र नहीं
आगाज़ की खातिर अहसास का खोना नहीं अच्छा


अक्षिणी 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

क्षितिज कहाँ..

क्षितिज कहाँ,देखा किसने
कौन वहाँ तक चलना है..
मरीचिका एक क्षितिज सी,
धरती अम्बर का मिलना है..
सूरज का ढलना भी केवल
मिथ्या मन की छलना है..
ओझल हो इन आँखों से,
और किसी ठोर निकलना है..
मत रोको रजनी को,
उसको भी अपनी कलना है.
नियति चक्र न थमता थामे,
व्यर्थ मनुज के काँधे छिलना है.. 

~अक्षिणी  

रविवार, 26 जुलाई 2020

Dear Daughter..

Dear daughter..
That I never had..
Wouldn't ever believe
Eyes my own..
The day I would have seen
The little bundle of joy
My very own..
Frail and fragile with an iron grip
Like my own..
The soft , thin ,firm little lips with
Amind of it's own..
Just like mine .
My very own..
Strong through thick and thin
Life that you could have been
Dear Daughter..
Be what you have been..
My beautiful unreal dream..
My dear Daughter..
That you could have been
Forever being alive
That spirit of my own..
To kindle a surreal dream..
Dear Daughter..
That I never could have..
My very own..

Akshini

शनिवार, 25 जुलाई 2020

आदमी ही तो है..

आदमी ही तो है..
मिलता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर ,
गिनता उसी को है जो मिलता नहीं..

आदमी ही तो है..
चाहता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
मिलता है जो यूँ ही उसे साधता नहीं..

आदमी ही तो है..
खोजता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
ढूँढता उसी को है जो जानता नहीं..

आदमी ही तो है..
जानता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
जानता जिसे है उसे पहचानता नहीं..

आदमी ही तो है..
सुनता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
करता मन की ही है जिसे गुनता नहीं..

आदमी ही तो है..
मानता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
ठानता उसी की है जो मानता नहीं..

अक्षिणी 

कल कोई..

कल कोई मुझसे मिला
राह के चाह में भटका हुआ
चाह की आह में अटका हुआ

कल कोई मुझसे मिला..
घाट के घुमाव में उलझा हुआ
धार के प्रवाह में दुबका हुआ

कल कोई मुझसे मिला..
राख के ढेर सा बुझता हुआ
आँच के फेर सा सुलगा हुआ

हाँ कल कोई मुझसा मिला..
काल के प्रहार से हारा हुआ
आस के विश्वास का मारा हुआ

हाँ कल कोई मुझसा मिला..

इक हाथ बढ़ा कर टोह लिया
बस मान बढ़ा कर मोह लिया..


अक्षिणी 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

दास्तान-ए-दलिया..

दास्तान-ए-दलिया
माँ ने दलिया बनाया
गरम था तो महका
सब ने चख के देखा
मगर.. उठा नहीं

फ्रिज़ में  धर दिया
शाम को निकाला
घी का तड़का लगाया
सब को समझ तो आया
मगर.. उठा नहीं

फ्रिज़ में धर दिया
सुबह फिर निकाला
दूध में भिगोया
चीनी में पगाया
मगर.. उठा नहीं

माँ कहाँ मानती है?
बादाम से सजाया
केसर में सगाया
चाँदी का वर्क लगाया
मगर..उठा नहीं 

फिर धूप में फैलाया
नींबू भी निचोड़ा
छुहारे सा सुखाया
फ्रिज़ में धर दिया
कभी तो उठेगा..

वही जो अभी तक
मगर..उठा नहीं..

अस्वीकरण : दलिया को दलिया ही समझें। सजीव निर्जीव से तुलना न करें।

अक्षिणी 


रविवार, 19 जुलाई 2020

वोट में खोट..

नालों के किनारे बस्ती बसा लेते हैं लोग
पहले दुछत्तियों और झुग्गियों की ओट
फिर भूमाफिया काट देता है प्लाॅट के प्लाॅट
देखते ही देखते खड़े हो जाते हैं लाट के लोट
सरकारें चुनावों में दे देती हैं वैधता की ओट
क्यूँ न दें?
हर एक को प्यारा है अपना वोट
बह जाएं और ढह जाएं तो कर्मों के खोट
मीडिया भी पहचानता बस कड़क नोट
हर बार बस मेंढकों की बरसाती चोट 
फिर सब के सब अपने हाल में लोटमपोट
और बँटने लगती है रेवड़ी की रोट
लुढ़कने लगती है जमीन की गोट

अक्षिणी 




 

शनिवार, 18 जुलाई 2020

किस्सा भेड़ों का..

1965 की बात है..तब भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे.. 
चीन की तरफ से घुसपैठ के प्रयास तो होते ही रहते हैं और उल्टा चोर कोतवाल डाँटे की तर्ज़ पर फिर वो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत पर अनर्गल आरोप लगाता है..
इस बार भी ऐसा ही हुआ..
भारत सरकार ने इस आरोप पत्र का लिखित में उत्तर दिया..
तब वाजपेयी जी 42 वर्ष के थे..उन्होंने चीन के इस ओछे आरोप का ऐसा जवाब दिया जिसकी चीन ने कल्पना भी नहीं की थी..
उन्होंने 800 भेड़ों की व्यवस्था की और उन्हें ले कर दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के बाहर खड़े हो गए..
सभी भेड़ों के गले में तख्ती लटकी थी..
"मुझे खा लो पर दुनिया को छोड़ दो.."
 इस तरह भेड़ों के साथ चीनी दूतावास में प्रवेश करने के प्रयास से चीन आगबबूला हो गया और भारत सरकार से माफी मांगने को कहा।
पत्र में चीन ने लिखा कि ऐसा प्रदर्शन बेइज्जती है और भारत सरकार की जानकारी के बिना इसका आयोजन असंभव है, इसके लिए माफी मांगी जाए।
भारत सरकार ने यह तो माना कि दिल्ली के कुछ लोगों ने भेड़ें लेकर दूतावास के समक्ष प्रदर्शन किया किंतु इसका भारत सरकार से कोई सरोकार नहीं है।

असल में चीन ने भारत पर यह आरोप लगाया था कि उसने चार चीनी नागरिकों का अपहरण कर लिया है।वे तिब्बती लोग थे जो भारत में शरणार्थी की तरह रहने आए थे जिनमें दो भेड़ें चराने वाली औरतें भी थीं।

तो ज़िक्र होता है जब चिंदीचोर चीनियों का
तो वाजपेयी जी के इस अनोखे प्रदर्शन की चर्चा होती है😂

अक्षिणी 

रविवार, 12 जुलाई 2020

प्रार्थना..

शाख-शाख पत्ते-पत्ते, छाता जाए अंधियारा मुँहजोर,
काले कैसे घोर अंधेरे, दिखता न किसी रोशनी का छोर

एक एक कर हारे मानव, बिलखे देखो आस के मोर
बढ़ता कैसा ये नवदानव, तोड़े जग की जीवन डोर

लील गया ये सूरज कितने, लूटे इसने तारे कितने
छीन रहा ये उम्रें कितनी, फूटे भाग के मारे कितने

छूटता धीरज कौन सहेजे, ढाढ़स कोई अब बाँधे कैसे
डूबता सूरज कौन उकेरे, साहस कोई अब साधे कैसे

हे ईश्वर कैसा अंधियारा, पार मनुज अब पाए कैसे
तेरा केवल एक सहारा, तुझ बिन नाव बचाए कैसे

अक्षिणी 

शुक्रवार, 26 जून 2020

संवाद..

ट्रिंग..ट्रिंग..ट्रिंग

* हलो..हाँ..कौन..
- जी मैं फलां पार्टी के सरदार का ढीकाना सचिव बोल रहा हूँ ..बीबीजी से बात कराएं..
* बीबीजी मुन्ने को गाय पर लेख याद करा रही हैं..कल टीवी पर देना है ना..नहीं आ सकती हैं अभी फोन पर..हम से ही बोलिए जो बोलना है..
- जी वो क्या है कि..कल जाँच एजेंसी को कोई पुराने कागज़ मिले हैं..कुछ पैसे तैसे का मामला है..
ज्यादा नहीं रक्षा बजट जितना ही..पुराना ही लगता है यही कोई दस बारह साल पुराना..छोटा मोटा..
* हमें काहे बता रहे हैं? आप सरकार में हैं..
एजेंसी आपकी है..
-सो तो है..बस एक बार बीबीजी से बात हो जाती..
* बीबी जी क्या करेंगी उसमें?
करिए आप जो बन पड़े।
- अरे मगर उसमें नाम जो है..बड़ों के साथ साथ बाल बच्चों का भी..समझ नहीं आ रहा क्या किया जाए..
* ई हमार सिरदर्द नाहि..बीबी जी को परेशान काहे करते हैं..
- तो क्या करें? मीडिया को दे दें?
* अऊर का..मीडिया को दीजिए..थोड़ा माहौल गर्माइए..
डिबेट कराइए..बच्चे हमें भी टीवी पर देखना चाहते हैं..
- वही हम भी सोच रहे थे..बीबी जी से पूछ लीजिए न एक बार..
* हम कह दिया हूँ ना..बेफिकर रहिए..
- फिर कितने दिन चलाना है मामले को?
* चला लीजिए दूई-चार दिन..
- दो चार दिन से क्या होगा? आखिर हमें भी लोगों को मुँह दिखाना है..एक हफ्ता तो कम अज कम..

*हफ्ता ज्यादा हो जाएगा..पाँच दिन बहुत हैं..
वो डेमोक्रेटिक चैनल पे हमें बुलवा लीजिएगा ..
कसम से एकदम मुर्गा लड़ाने वाली फीलिंग आती है..
हमें गिरफ्तार करने का चैलेंज दे देंगे टीवी पर ही..
दबाव तो बनाना पड़ेगा..

- अरे..धीरे धीरे बोलिए..नोट कर रहे हैं ना..भूल गए तो..और पाँच दिन के बाद..?

* ये भी हम बताएं? उ का कहते हैं ससुरा ओपोलोजी..

- नहीं नहीं..समझ गए .. सरदार साहब से कहेंगे कि अपाॅलाजी मांग लें बीबी जी से..सार्वजनिक?

* सार्वजनिक काहे? कोनो चोरी किए हैं का..?
थोड़ा पइसा तो आपन अकाउंट में जमा कराए हैं..
स्सारा अकाउंटेंट का मिस्टिक रहा..
उही से मँगवाइए माफी..बीबी जी साथ खड़ी हो जाएंगी..

- जी..बड़ा सहारा है आपका..
बीबी जी को प्रणाम बोलिएगा..अच्छा रखते हैं..रोम रोम..

अक्षिणी 

शनिवार, 20 जून 2020

पुरुष का सौंदर्य..

पुरुष का सौंदर्य
पुरुषार्थ हुआ करता है
पौरुष को जो
चरितार्थ किया करता है
वेदव्यासवाल्मिक फिर
महाकाव्य रचा करते है
नख से शिख सब
विस्तार लिखा करते हैं
कोमल मन तज जो
संग्राम लड़ा करते हैं
पिता-पुत्र-प्रिय-भ्राता 
बन प्यार किया करते हैं
उर में असीमित जो
उद्गार लिए जिया करते हैं..

अक्षिणी 

मंगलवार, 16 जून 2020

हे शब्दों के छद्म लड़ाकों..

हे शब्दों के छद्म लड़ाकों,
यूँ बातों में युद्ध हराओ ना..
मैं प्रहरी हूँ इस सीमा का,
तुम जोश में होश गँवाओ ना..
कुछ विश्वास मुझ पे भी जताओ ना..

जागृत हूँ मैं, उद्यत भी
तुम व्यर्थ के दोष लगाओ ना..
सक्षम हूँ मैं, सज्जित भी,
तुम बातों के बाण चलाओ ना..
कुछ विश्वास मुझ पे भी जताओ ना..

जागृत हूँ मैं, उद्यत भी
तुम व्यर्थ के दोष लगाओ ना..
सक्षम हूँ मैं, सज्जित भी,
तुम बातों के बाण चलाओ ना..
कुछ विश्वास मुझ पे भी जताओ ना..

अक्षिणी 



रविवार, 14 जून 2020

एक पुराना कुरता

एक पुराना कुरता देखा,
देह पुरानी याद आई..
कैसे समाऊं खुद को उसमें
मेघ सी आँखें भर आईं..

कैसे कहूँ मैया मेरी
पीर ये कैसी दुखदाई..
तन्वंगी सी काया मेरी
कद्दू जैसी हरियाई..

एक पुराना कुरता भूली
काया दर्पण में न समाई
कौन सुने अब दुखड़ा मेरा
नाव ये मेरी मैंने डुबाई

लाख जतन किए पर
पार न मैं पाने पाई..
जल भी लगे तन अब
लगती है पुरवाई..

पीछे पड़ा देखो भार ये बैरी
कैसे हो अब इसकी छँटाई..
खैर पुराना कुरता छोड़ा
साड़ी झट ली अब लपटाई..


अक्षिणी 


शुक्रवार, 12 जून 2020

बीती बरसात का..

बीती बरसात का पानी है, ठहर जाए तो चलें..
भीगी अश्कों की रवानी है, उतर जाए तो चलें..

रोज सीते हैं दिल के जख़्मों को,
नश्तर-ए-वक्त से चाक कदमों को, 
रिसती यादों की निशानी है,बिसर जाए तो चलें ..

कौन डरता है इन हवाओं से,
कौन जलता है दिल के दागों से,
दहकी कोई ख़ाक पुरानी है, सिमर जाए तो चलें ..

कितने जन्मों से चली आई है,
कितने लम्हों से छली आई है,
वही करमों की कहानी है, सिमट जाए तो चलें ..

कौन रुकता है सख़्त लफ्ज़ों से
कौन झुकता है तल्ख लहज़ों से
जज़्ब जज़्बों की जुबानी है, समझ आए तो चलें..


कौन समझा है तेरे जलवों को,
कौन सुनता है मेरे शिकवों को,
कोई अरदास पुरानी है जो बिसर जाए तो चल दें..

बीती बरसात का पानी है ठहर जाए तो चल दें..
भीगी आँखों की रवानी है उतर जाए तो चल दें..

अक्षिणी 


शुक्रवार, 22 मई 2020

हम..

पिछड़े सही हम 
क्योंकि 
पिघले नहीं हम..

अकड़े सही हम,
क्योंकि 
उखड़े नहीं हम..

झगड़े सही हम,
क्योंकि 
बदले नहीं हम..


उछले नहीं हम,
क्योंकि 
छिछले नहीं हम..


अक्षिणी 



गुरुवार, 21 मई 2020

पेट की बात..

पापी है तो क्या हुआ पेट तो आपका अपना है।
इसका खयाल रखें. इसे आराम दें।

प्रतिदिन नियमित रूप से पाँच-छ बार पूरा भरें और भरते ही लेट जाएं।
ऊर्ध्वाधर अवस्था में रख इस पर अत्याचार कदापि न करें।

महीने भर बाद इसके विकास की समीक्षा करें और आवश्यकता हो तो खुराक बढ़ाएं। 
एकरसता से कोई भी ऊब सकता है।
विविधता में ही जीवन का आनंद निहित है।
पेट भी यही चाहता है। 
प्रतिदिन नाना प्रकार के व्यंजनों से उदराभिषेक करें।
इसे तनिक भी बोरियत महसूस न होने दें।
इसका खयाल रखें।
ये आपकी शारीरिक समृद्धि में वृद्धि करेगा क्योंकि यह आपकी आर्थिक संपन्नता का प्रतीक है।

यूँ भी कोरोना की सबसे बड़ी मार इसी पर पड़ी है..
पान और पानपराग दोनों के स्वाद से वंचित है बेचारा..
कहाँ "संडे से संडे" पूरे सप्ताह समोसे कचोड़ी  खाता था आज रायते की बूँदी को तरस गया है।
जलेबी इमरती के दोने समान गति से चाटता था.. 
संभवतया अब देखने को मिलें..

तीन तरह के गोलगप्पों में नौ तरह के पानी से चटखारे लिया करता था.
उदर का सारा तंत्र ही गड़बड़ा गया है,बेचारे के ए-कोली से जेड-कोली तक के बैक्टीरिया तड़प रहे हैं.
सुनिए उनकी कातर पुकार और मौन आर्तनाद।
रोज खिलाएं कुछ चटपटा और मजबूत करें विश्वास सहअस्तित्व में।
साथ दें अपने उदर का।

आज जैव विविधता दिवस है..कुछ पुण्य कमाएं..
अपने पेट के सूक्ष्म जीवों को साठ भोग खिलाएं..
(56 का प्रयोग वर्जित है क्योंकि उसे सुनते ही पिद्दियों को अतिसार हो जाता है और हम चिकित्सालयों पर भार नहीं बढ़ाना चाहते..)

उदर समृद्धि के अन्य उपायों के लिए अनुसंधान करें और अपने बहुमूल्य सुझाव बाँटें।(कहना पड़ता है,परंपरा है)
समझ तो गए होंगे आप!
निकट भविष्य में उदरामृत का ठेला लगाने की योजना है..
प्रधानमंत्री लघु उद्योग प्रोत्साहन के अंतर्गत ऋण स्वीकृत हो जाए तो..

याद रखिए पेट है तो हम हैं..
पेट से ही अपना दम खम है..
प्रगति और वृद्धि मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है.
शरीर की उर्ध्व वृद्धि रूक जाने के बाद क्षैतिजक विकास करें..
आप सभी को सपेट शुभकामनाएं।

अक्षिणी 

बुधवार, 20 मई 2020

अपराधी..

न राज का भय
ना समाज का भय
ना आत्मा-परमात्मा का भय
न भूत का भय
न भविष्य का भय
न कर्म का न धर्म का भय
आज,आज में लीन
भयहीन पथभ्रष्ट 
निर्लज्ज स्वलीन
आत्ममुग्ध 
आत्मघाती 
मनुष्य 
अपराधी तो है ही..

अक्षिणी 

मंगलवार, 19 मई 2020

कुछ कहें..

जो समझ पाएं तो क्या कुछ कहें,
ना भी समझ पाएं तो क्यूँ कुछ कहें..
जो ठहर जाएं तो बहुत कुछ कहें,
कह के गुज़र जाएं कि क्या कुछ कहें..

अक्षिणी ..

बुधवार, 13 मई 2020

मरुस्थल की बेटियाँ..

मरुस्थल की बेटियाँ 
खेजड़ी सी होती हैं 
सीधी सादी बेपरवाह
सब से बेखबर 
डटी रहती हैं बारहों मास
निरपेक्ष सहती हैं ताप 
और आँधी तुफान
खड़ी रहती हैं सर उठाए
अपनी अस्मिता लिए
कैक्टस के काँटों के बीच
जीवन रेत के अँगारों में 
संघर्ष के स्वरों में लीन..

अक्षिणी 

मंगलवार, 12 मई 2020

चाह..

नहीं..
नहीं कोई चाह बसंत तेरे वैभव की
तेरे कुसुमित सुमन सौरभ की
बस चाह तपित बनतरू सौष्ठव की
जो साध सका हो मुक्ति निर्मोह की..
🙏

अक्षिणी 
उमा आर्या की मूल कविता का हिन्दी अनुवाद। 

Don’t bring me the splendour of spring 
It’s glory is short lived! 
Give me the austere trees 
Composed in renunciation..

रविवार, 10 मई 2020

सपना..

हर आँख का सपना,
पहाड़ों की घाटियों पर,
हो घर अपना..
दूर से दिखती हो,
बल खाई तन्वंगी सी 
एक सड़क..
पास से गुजरती एक,
नीली सी एक नदी..
इसी उम्मीद में,
जिया करते हैं  रोज.. 
शहरों की माचिसों,
में रहने वाले लोग..

अक्षिणी

शनिवार, 9 मई 2020

शुकर है कि मुगल आए..

मुगल बहुत महान थे। उनके आने से पहले भारत एक सपाट मैदान था जहाँ कीड़े मकोड़े रहा करते थे। कुछ आदिवासी थे जो पत्ते लपेट कर जीते थे।
मुगलों को हम पर दया आई और वे ऊँटों पर लाद कर हिमालय को यहाँ  ले आए।
शेष तो आपको पता ही है कि कैसे खाड़ी से पानी ला कर गंगा जमुना बनाई गईं। 
मुगल अपने रेशमी चोगों में भर कर रेत लाए और उसे गुजरात और राजस्थान में बिखेरा ताकि थार का रेगिस्तान और कच्छ का रन बना..
आभार मानिए वरना क्या था हमारे पुरखों के पास..

मुगलों के आने से पहले भारत के आदिम लोग कोक्रोच और झिंगुर पकड़ कर कच्चा ही खाते थे..मुगल आए तो छकड़ों में लाद कर पेड़ लाए..फिर उन्होंने फूलों और फलों के पौधे लगाए..उन्हीं में से कुछ छकड़ों में वे आग भी लाद कर आए..उन्होंने हमें खाना पकाना सिखाया..

आप विश्वास नहीं करेंगे किंतु यह सत्य है कि मुगलों के आने से पूर्व हम रेंग कर चलते थे और रेंक रेंक कर इशारे से बात करते थे।
मुगलों ने हमें सीधे खड़े हो कर चलना सिखाया।
हम आभारी हैं कि उन्होंने हमें उर्दु भाषा सिखाई जिससे हमने पहले हिन्दी और फिर संस्कृत बनाई..

बेचारे मुगल कितने भले थे..
ईरान से सफेद मार्बल और लाल पत्थर लाए उसे मकराना और धौलपुर की खदानों में रखा..फिर निकाला और उसी से ताजमहल और लाल किला बनवाया वरना हम तो पेड़ों के नीचे रहते थे।

रणकपुर, दिलवाड़ा, उम्मेद भवन सब मुगलों का दिया है..रहीम और रहमान यहाँ आए तभी तो रैदास बने..रामायण और महाभारत भी उनके ही किसी ग्रंथ का अनुवाद होगा..
सुनने में तो यह भी आया है कि मुगलों के लाए बहाए पानी से हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी जैसी छोटी मोटी पोखरियों का इतना विस्तार हुआ..

मुगलों ने उठाई लहरें तो नीलगिरि और शिवालिक अस्तित्व में आए..

मुगलों के आने से पहले हमारे बच्चे और औरतें फालतू मक्खियां मारा करते थे..
मुगलों ने उन्हें अपने हरम में काम दिया..


भला हो मुगलों का जो हम दीन हीन गरीब भारतवासियों की सुध ली वरना हम तो अब तक लकड़ियां ही बीनते रह जाते..
ऋणी हैं हम..

🙏
अक्षिणी 

आँख नम..

है आँख नम और शब्द कम,
दग्ध ह्रदय में कितना मातम..
रीती झोली खाली दामन,
चुक गया क्या उसका मरहम..

मरहम का क्या कीजे 
जब न प्राण हम में.. 
क्या हरे संताप जब
ना बचे जान हम में ..


अक्षिणी 

शुक्रवार, 8 मई 2020

चलो..

चलो राष्ट्र के विकास को आग लगाएं, 
अर्थहीन मुद्दों को तूल दे मसला बनाएं..
चलो प्रगति के पहिए को तीली लगाएं,
मजदूरों के नाम फिर कोई दुकान लगाएं..

चलो प्रशासन की मुश्किलें बढ़ाएं,
देश की बनती को बिगाड़ आएं..
यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ आग लगाए,
अर्थतंत्र की अर्थी को कांधा दे आएं..

चलो आज हम ये पुण्य कर आएं,
कामगारों को नये झंडे पकड़ाएं..
समृद्धि-रथ कहीं दौड़ ही न जाए,
इसके घोड़ों की नाक नकेल लगाएं..

तरक्की की राह कहीं खुल ही न जाए, 
राष्ट्रदेव को मंजिल कहीं मिल ही न जाए..
निर्माण के स्वर समूल राख कर आएं, 
चलो आज फिर नया कोई पलीता लगाएं..

अक्षिणी 

लगंतुक-बुझंतुक पुराण ..

आज उन की बात करते हैं जिनका योगदान हमारी सभ्यता को घटना प्रधान बनाने में प्रशंसनीय है..
यदि उनके अनुगामी न होते तो मनुष्य जीवन
अत्यधिक नीरस होता.
लगाई-बुझाई कला के पारंगतों को नारद जयंती की शुभकामनाएं..
यह एक ऐसी महत्वपूर्ण कला है जिसे अब तक इसका उपयुक्त स्थान नहीं मिला है..
चिर काल से चली आ रही इस परंपरा की आकस्मिकता के चलते ही जीवन नूतन बना रहता है..
आइए आज हम और आप मिल कर 64 कलाओं में सम्मिलित न कर इसके साथ किए अन्याय का अपराध बोध थोड़ा कम करें.. 
प्राचीनकाल की मंथराओं और शकुनियों से लेकर वर्तमान युग के सभी संजयों तक इनकी बड़ी ही समृद्ध परंपरा रही है..ये इतिहास पुरुष हैं जिनकी भूमिका की सराहना और प्रशंसा करने के स्थान पर इन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है..मनुष्य जाति का यह अपराध निंदनीय है..

इतिहास ने ही नहीं भाषा ने भी इनके साथ घोर अन्याय किया है..ऐसा कोई शब्द ही नहीं है जो इनके विस्तृत कार्यपत्रक यानि पोर्टफोलियो का प्रतिनिधित्व कर पाए..इसके उसके नामों से पुकारा जाना मुझे स्वीकार्य नहीं है..लगता है यह धृष्टता मुझ अकिंचन को ही करनी होगी।

चुगलखोर शब्द का सुझाव है किंतु यह इन कर्मठ महानुभावों को हेय दृष्टि से दिखाता है.
मेरा सुझाव है कि इनकी कार्य प्रणाली का ध्यान रखते हुए इन्हें लगंतुक-बुझंतुक कहा जाए.
कोई एक शब्द इनके कौशल का प्रतिनिधित्व  नहीं कर पाएगा.
आप के सुझाव आमंत्रित हैं किंतु अभी के लिए यह ठीक है।

लगंतुक-बुझंतुक वर्ग के व्यक्ति बड़े ही निस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठ और परिश्रमी होते हैं।
एक धनुर्धर की तीक्ष्ण दृष्टि,तत्परता व मनोविज्ञान रखते हैं कि कब कौनसा संधान कहां करना है।
आप और मैं इनकी दिव्य दृष्टि की कल्पना भी नहीं कर सकते.मानव मन की इनकी समझ और दूरदर्शिता भी वंदनीय है.


बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लगंतुक-बुझंतुक वर्ग
मानवीय संबंधों की क्रिया-प्रतिक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
अपने अदम्य साहस और अभूतपूर्व रणकौशल के चलते ये लोग स्वयं की रक्षा बखूबी जानते हैं..
घर गाँव शहर जल जाए परंतु इन पर आँच न आए..

ईश्वर भी निश्छल और निस्वार्थ लगंतुकों-बुझंतुकों की सहायता से अपना कार्य साधता है और अपयश मिलता है इन्हें.
यदि मिल्टन का स्वर्ग सर्परूपी शैतान के कारण न खोया होता तो संसार कहां होता?
इसलिए अपने आसपास के लगंतुकों-बुझंतुकों को पहचानें,उनसे दूरी रख उनका सम्मान करें।
नारायण नारायण।
🙏

अक्षिणी 

गुरुवार, 7 मई 2020

शिक्षकों की कुंठा..

एक गणित शिक्षक सदैव ऋणी रहेगा श्री #RiyazNaikoo का जिन्होंने गणित को आतंक के आकाश में अभूतपूर्व स्थान दिलाया..आज सारे विषयों में कुंठा की लहर व्याप्त है कि हाय हम न हुए..

प्रगति और उन्नति मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है।
विश्व के अनेक देशों में रक्तवर्णी धमाकों के क्षेत्र में अभियंताओं और  सॉफ्टवेयर वर्ग का वर्चस्व देख कर शिक्षक वर्ग में छाई हीनभावना को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है श्री #RiyazNaikoo जी ने..
निशब्द हैं हम..!
आभार..!

शिक्षकों का आत्मविश्वास तो तभी हिल गया था जब तीन बरस पहले एक शिक्षक के नादान बेटे का मर्सिया दरखा बट्ट द्वारा पढ़ा गया.
हिंदुस्तानी फौज ने काम जो तमाम कर दिया उसका.
क्या दोष था बेचारे का?
मेहनत कर के हिजबुल में नाम रोशन किया था उसने.
आज देश का हर शिक्षक खुशी से फूला नहीं समा रहा.
प्रतिक्रिया देखिए..
हिंदी वाले -
ये गणित वालों की हर जगह आगे रहने की बीमारी कब जाएगी..?

अंग्रेजी वाले -
Now Mathematics teacher would always be served first..First come first served..

History teacher : 
 इतिहास साक्षी है गणित ने सदैव differentiation ज्यादा किया है
Integration कम..

केमिस्ट्री टीचर - 
मैन्यूफेक्चरिंग, R&D का काम है अपना..
लंबा चौड़ा है..
एजेंसियों ने चाहा तो जल्दी ही अपना भी कोई बंदा निकल ही जाएगा..
 फास्फोसल्फल्ला..
😭

भविष्य के गणित के मशहूर होने वाले शिक्षक..
ये आर्मी वाले गणित समझते ही नहीं..
Radicals को Rationalise करने की बजाय Neutralise कर देते हैं..🤪🤪

जयहिन्द ।

अक्षिणी 

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

खेजड़ी..

आ धोरां री बिंदणी
थार री कणी
रेत मा थणी सांगरी 
मरवण आपे जीवणी
मिनख जिनावर
आस दीवणी
बारा मास
आ बणी ठणी
जेठ मां फळी 
सदा सुहागण 
खेजड़ली.
*खेजड़ी थार का कल्पवृक्ष,मरुधरा की जीवनरेखा कहा जाता है.
कहते हैं यह जेठ में भी हरा रहता है.
केर सांगरी की सब्ज़ी में सांगरी इसी का फल होता है। 

रविवार, 26 अप्रैल 2020

दिन बंजारे..

दिन बंजारे,
जाग के हारे..
रात की पल-पल,
बाट निहारे..

दिन बंजारे,
मोह के मारे..
रात की देहरी,
मौन बुहारे..

दिन बंजारे,
धूप सहारे..
रात की झोली,
चाँद सितारे..


अक्षिणी 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

क्या जाने..

क्या जाने हँसता है कि रोता है देख के दुनिया वो,
तय है कि उसे फ़ख्र न होता है देख के दुनिया को..

आ ही जाता जमीं पे अगरचे आ ही पाता वो,
जो कर ही जाता तो कहां ईश्वर कहलाता वो?





अक्षिणी 

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

तेरी हो के मेरी..

गलत नहीं,ना सही,दुनिया में शै कोई,
बात आदत की है,फिर तेरी हो के मेरी..

मुश्किल हालात सही,फूल बारात नहीं,
बात हिम्मत की है,फिर तेरी हो के मेरी..

तू नहीं, ना सही, यूँ कभी मेरे साथ कहीं,
बात फितरत की है,फिर तेरी हो के मेरी..

तल्ख अल्फाज़ सही, सख़्त अंदाज सही,
बात कीमत की है, फिर तेरी हो के मेरी..

सुबह नहीं,ना सही, स्याह बस रात सही, 
बात किस्मत की है, फिर तेरी हो के मेरी..

अक्षिणी ..

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

बिखरे लम्हे..

इज़हार पे पाबंदी,इकरार पे पहरे हैं,
अंदाज-ए-बयानी के राज़ ये गहरे हैं..

जुस्तजू-ए-क़फ़स हो के ज़ज्बे ज़िंदगी,
आग़ाज़ भी तन्हाई अंजाम भी तन्हाई ..

आगाज़ तो होता है या रब,अंजाम नहीं होता,
जब तलक मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता..

क्यूँ चुप रहें और सहें खुदाया
अगरचे चुप रह के पछताएं ..
है गर नतीजा एक ही तो है बेहतर,
कि कर के कुछ अर्ज़ पछताएं..

वक्त के पन्नों पर सैंकड़ों किस्से हैं,
कौन जाने कौनसा आपके हिस्से है..

ये ट्विटर है मेरे यार..
शब्दों और शब्दों का संसार,
शब्दों के परे पढ़ना है बेकार..
न कुछ पंक्तियों के दरमियां,
ना पंक्तियों के आर पार..

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

Write my friend..

Dear friend,
Write what you live,
Live what you write.
No scope whatsoever, 
to tinker what you write.

Write if you must,
Write what you must.
Have faith in yourself,
Words must you trust.

Write if you feel,
Write what you feel.
Feel what you write,
See, not a big deal.. 

Write if you read,
Read if you write.
Be a worm of words,
Write what you bite..

Write if you think,
Write if you blink..
For word is a ship,
Don't let it ever sink..

Akshini

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

नव युवा ओ देश के..

तू कर्ण बन के जी
या पार्थ बन के जी
नव युवा ओ देश के
पुरुषार्थ कर के जी

प्रहलाद बन के जी
या श्याम बन के जी
नव युवा ओ देश के
श्रीराम कह के जी

तू धर्म बन के जी
या मर्म बन के जी
नव युवा ओ देश के
तू कर्म कर के जी

तू प्राण बन के जी
या मान बन के जी
नव युवा ओ देश के
नव प्रतिमान बन के जी

अक्षिणी 

बुधवार, 22 जनवरी 2020

कसरत..

हाथों पर क्रीम लगाना,
बैग में दस्ताने ढूँढ़ना,
उन दस्तानों को पहनना,
फिर फोन की घंटी बजना,
दस्ताना उतार उसे उठाना,
फिर से दस्ताना पहनना,
साधारण सी बात है ना?
और ये सब कुछ 
स्टीयरिंग पकड़े हुए करना..?

अक्षिणी 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

वक्त वक्त की बात..

आज मिले थे वो
मिले तो खैर क्या 
बस दिखे थे वो
सब कहीं थे वो
खिली मुस्कान लिए
गालों पर रंग लाल लिए
उम्मीद से देखते हुए
नजर को तरसते हुए
सब चले जा रहे थे 
बिना कोई भाव दिए
कौन पूछता?
कल
उड़ रहे थे हवा में जो
आज
ज़मीं पे आ गिरे
वक्त किसी का कब हुआ 
फिर वो
आदमी हो या टमाटर..😋

अक्षिणी 

रविवार, 12 जनवरी 2020

कुछ लोग..

गलतफहमी में इस तरह जीया करते हैं कुछ लोग,
शायरी के नाम पर सियासत किया करते हैं कुछ लोग..

शिक्षा के नाम पर बस ऐश किया करते हैं कुछ लोग
यूँ मुल्क का नमक अदा किया करते हैं कुछ लोग..

किस कदर एहसानफरामोश हुआ करते हैं कुछ लोग,
हुकूमत ना मिले तो दंगे किया करते हैं कुछ लोग..

वतन के लिए खूं की दुहाई दिया करते हैं कुछ लोग,
वक्त आए तो दामन छुड़ा लिया करते हैं कुछ लोग..

शेर कहते हैं कभी, गज़ल कहा करते हैं कुछ लोग,
देश की बरबादी पे नज़्म पढ़ा करते हैं कुछ लोग..



अक्षिणी 

शनिवार, 4 जनवरी 2020

O beloved country of mine..

O beloved country of mine
You have a character so divine..

The land of yours is so pure
The skies of yours so sure
The woods too deep and green
For years of lives to endure

The hills of yours are so old
The snow of centuries to uphold
The plains are so calm and cool
To hold the mysteries untold

The songs of rivers to chime
With the seas of breeze n brine
O thy tales of changing time
Life and death of reason n rhyme

O beloved country of mine
You have a character so divine..

Akshini

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

हास्य कविता..

व्याकरण के गाँव में जब
इक हास्य कविता आई
हाथ घूँघट थाम बैठी
सिकुड़ी,सकुची और शर्माई
सर्व रूप श्रृंगार किए वो
नेह मिलन की आस लाई
नववधु थी गाँव की वो
होनी ही थी मुँह दिखाई

फिर चंद्रबिंदु अनुस्वार की बारी
फिर अलंकार ढूँढे सब नर नारी
वर्ण और व्यंजन भाव पे भारी 
बिन विराम के देखो दे दे तारी
हास न जानें, परिहास न मानें
मर्म न समझें, दें मात्रा की दुहाई

व्याकरण के गाँव में जब 
इक हास्य कविता आई..
नववधु थी वो गाँव की
खूब भई फिर मुँह दिखाई..

नये घर में वो अबला नारी
लाज की मारे चुप थी बेचारी
झुक झुक देखो पैर लगे जो
संधि कर कर मंशा वो हारी
खूब थी उसने जुगत लगाई
फिर भी देखो समझ न पाई

व्याकरण के गाँव में जब
इक हास्य कविता आई
मर्ज़ी की जो चाल दिखाई 
भूल गए सब मुँह दिखाई..

अक्षिणी 

बुधवार, 1 जनवरी 2020

चाय के दोहे..

कड़क हो या कड़वी,बिस्तर में मिल जाय ।
चाय वही अच्छी जो कोई दूजा देय बनाय ।।

हीरा मोती सोना चांदी,कुछ न मुझको भरमाए ।
एक अदद चाय मिले,मुखड़ा खिलखिल जाए।।

पीस के लौंग इलायची,अदरक लई कुटाय ।
पीण वारो आन मिले, चाय देऊं चढ़ाय।।

साथी सगळा हामळ भरे, बैठा नाड़ हलाय ।
कोई न छोड़े बैठको, चाय किंकर बण पाय ।।

चाय बणावो सब कहे, दूध न लावै कोय ।
ब्लैक टी के नाम पर, भृकुटि तिरछी होय ।।

ग्रीन टी के नाम को , खूब मचावै शोर ।
घास-फूस ने चाब के, भैंस ना पतली होय।।


अदरक इलायची डार के,चाय लई बनाय।
फिर मोबाइल को टापते, फ़्रिज में दई धराय।।

यों सूरज के ताप सों,चाय रही घबराय।
गरम चाय तजि सब,अपनाए ठंडी चाय।।

यो तुम मोसे ना कहो, कि चाय दियो भुलाय,
चाय बिना के जीवणो,जनम अकारथ जाय..




अक्षिणी