रविवार, 1 जुलाई 2018

कब तक..

गुस्सा कम बेचारगी का
अहसास ज्यादह..
हर बार की तरह शोर होगा
कुछ मोमबत्तियाँ जलेंगी
कुछ तसवीरें होंगी
लम्बी बड़ी तकरीरें होंगी
जुलूस निकाले जाएंगे
नारे लगाए जाएंगे
फिर बगैर कुछ किए
घर जा कर सो जाएंगे,
किसी और चीख की
आवाज़ पर जागने के लिए,
यही सब कुछ दोहराने के लिए..
आखिर कब तक..?

अक्षिणी

एक कोख फिर..

सहमा सा  है हर कदम
डरा डरा सा है ये मन
कातर आँखों में छलक
आई है बेबसी
मासूम चेहरे पे झलक
आई है बेचारगी
छली गई है बिटिया
एक बार फिर
उजाड़ी गई है नन्ही सी
एक कोख फिर..
हैवानियत की हदों के पार,
शब्द नहीं बस सन्नाटे हैं
वहशी हवस के थपेड़ों की मार
पत्थर भी चीखे जाते हैं..
जाने कैसे ये भेड़िए
ईंसान कहे जाते है..

#भेड़िए

अक्षिणी

शनिवार, 30 जून 2018

अजनबी आईने..

शहर के आइने अब अजनबी से लगे हैं,
जानते ज़रूर हैं मगर पहचानते नहीं हैं..

अक्षिणी

मंगलवार, 26 जून 2018

कोलाहल के आगे...

Where sound can not travel light can..let there be light of inner peace and contentment without the usual contortions of sound..

देखो कैसा कोलाहल है
बाहर भीतर फैला जंगल
शून्य हुए सारे स्पंदन

कोलाहल के शून्य में
खो जाते स्वर संज्ञा के
कैसे सुन पाएं स्वर प्रज्ञा के

आवाज़ों के कोलाहल को
त्याग चलो और मौन चुनो,
सारे अंधियारे सो जाऐंगे,

अंतरतम का मौन सुनो,
दीप्ति लिए संतृप्त चलो ,
मन में उजियारे हो जाऐंगे..

अक्षिणी

रविवार, 24 जून 2018

दोस्त..

उसने एक ही बार कहा कि व्यस्त हूँ,
फिर मैंने कभी नहीं कहा कि मैं दोस्त हूँ..

अक्षिणी

शनिवार, 23 जून 2018

ट्विटर के दोहे..

फेसबुक से वाट्सएप को,
वाट्सएप से ट्विटर को आए
ट्विटर से भी बोर हुए,
अब "शिकंजी" कहाँ जाए..

ट्विटर खेलन मैं चली,
अकाउंट लियो बनाय
बार बार के ट्विटते,
"शिकंजी" गई बौराय

ट्विटर ट्विटर मैं करूँ,
अंगुली गई थकाय,
ट्विटत ट्विटत ओ "शिकंजी",
दिमाग दही होई जाय..

आरटी आरटी सब करे,
आरटी मिले न मोय,
लाईक लाईक देख "शिकंजी",
मनवा मोरा रोय..

कोई ट्विट तो यूँ चले,
चार आरटी होय जाए.
इशक विशक की शायरी,
"शिकंजी" को जरा ना आए ..

ट्विटर की महिमा का कहें,
सब कुछ दियो पढ़ाय.
गाली जानत ना "शिकंजी",
ट्विटर दीन्ह सिखाय..

आरटी ढूंढन मैं चली,
आरटी मिले न हाय,
लाईक लाईक के फेर में,
"शिकंजी",ट्विट अकारथ जाए.

देर रात तक ट्विटर चले,
उल्लू बन ट्विटियाए..
नहाय धोय के हाय "शिकंजी",
ट्विटर पर डट जाए..

अक्षिणी

हरी इच्छा..

अपने सोचत कछु नाही,
हरी सोचे सब होय..
हरी इच्छा के सामने ,
जग सब बेबस होय..

अक्षिणी