रविवार, 14 दिसंबर 2025

ढब जा ए इंदर राजा..

खेतां ऊबी ज्वार गळगी, 
साग की सारी क्यार गळगी
त्राहि-त्राहि मिनख बोळगो
ढब जा ए इंदर राजा,घणो हो ग्यो
जेठ लागतां चालू होगो
सावण बीतो भादो चाळगो
इश्यो-किश्यो चौमासो होगो
ढब जा ए इंदर राजा,घणो होग्यो
गांव डूब ग्या, ठांव डुब ग्या
ढोर-ढंगर आजी आया..
सूरज बापड़ो ठंडो पड़गो..
ढब जा ए..

~अक्षिणी

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

आह बिना चाह क्या?

आह बिना चाह क्या, 
चाह बिना राह कहाँ?

ताप बिना आँच क्या, 
आँच बिना साँच कहाँ?

लहर बिना भँवर नहीं, 
भँवर बिना सफर कहाँ?

धूप बिना छाँव नहीं, 
छाँव बिना ठाँव कहाँ?

ज़हर बिना असर नहीं,
असर बिना कदर कहाँ?

रात बिना बात क्या,
सुबह बिना रात कहाँ?

~अक्षिणी